कोहराम न्यूज़ – स्पेशल रिपोर्ट

देशभर में गोरखपुर हादसे के बाद से ही लगातार विभिन्न अस्पतालों में बच्चों के मरने का सिलसिला जारी है यूपी के बाद मध्यप्रदेश और उसके बाद छत्तीसगढ़ से भी ऐसा ही दुखद समाचार सुनने में आ रहा है. हालाँकि मौत का कारण अलग-अलग हो सकता है परन्तु मासूमों की मौत से देश के नागरिकों में व्याकुलता का माहौल है. गौरतलब है की गोरखपुर प्रकरण में बच्चों को बचाने के लिए डॉ. कफील की खबर को कोहराम न्यूज़ ने प्रमुखता से प्राकाशित किया था. इसके बाद से ही विभिन्न अस्पतालों में हमारे संवाददाताओं के दौरों का सिलसिला जारी है. इस कड़ी में हम पहुंचे उत्तराखंड के रुद्रपुर स्थित मेडिसिटी हॉस्पिटल में, जहाँ सीनियर डॉक्टर पी.के.सिंह ने अस्पताल में मिलने वाली सुविधाओं के बारे में अवगत कराया, उसके बाद हम पहुंचे हॉस्पिटल के डायरेक्टर तथा प्रमुख डॉक्टर दीपक छाबड़ा के पास, उन्होंने विस्तार से हमें बताया की किस तरह वह अपनी टीम के साथ मिलकर जनता को स्वास्थलाभ करा रहे है.

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समय से पूर्व जन्म (7 माह में) लेने वाली बेबी शैली का वज़न जन्म के समय मात्र 800 ग्राम था. जिसे जन्म पूर्व सांस लेने में दिक्कत का सामना हो रहा था. पटपडगंज दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल से रेफ़र की गयी बेबी शैली को जब मेडिसिटी में एडमिट कराया गया, उस समय नाज़ुक हालत के कारण डॉक्टर कुछ भी कहने में असमर्थ थे लेकिन डॉक्टर दीपक छाबड़ा ने तुरंत अपनी टीम को एकत्र किया और एनआईसीयू में एडमिट करायी गयी बच्ची की जान बचाने के लिए टीम एक-साथ जुट गयी कुछ ही दिनों की कोशिशों के बाद मासूम को खतरे से बाहर ले आया गया. जहाँ अब बेबी शैली की रोने की आवाज़ से एनआईसीयू में किलकारियां गूँज रही है वहीँ पेरेंट्स की आँखों में ख़ुशी के आंसू रुकने का नाम नही  ले रहे है.

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“खर्चा नही आएगा, बस बच्चा बच जाएगा” – यह कहकर गरीब पिता को दिलासा देते डॉक्टर दीपक छाबड़ा (एम्.डी.)

छह वर्ष का बच्चा जिसे पिछले 4 वर्षों से सांस लेने में दिक्कत थी. माता-पिता द्वारा आरम्भ में ध्यान ना दिया जाने के कारण समस्या बढ़ती ही गयी यहाँ तक की चार वर्ष निकल गये और जब मामला दीपक छाबड़ा के सामने पहुंचा तब टाक काफी देर हो चुकी थी पास अधिक बढ़ जाने के कारण बच्चे के फेफड़ों में मात्र 10% ऑक्सीजन भी नही पहुँच पा रही थी. आसान शब्दों में कहा जाए तो ईलाज करने वाले पुराने डॉक्टरों  ने जवाब दे दिया था लेकिन जब हम इस बच्चे के पास पहुंचे तो दो दिन पहले ही इसका ऑपरेशन करके पस निकाल दिया गया था और अगले तीन दिन में बच्चे को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया जाएगा.

वहीँ एक केस ऐसा सामने आया जो एक लाख में से मात्र 1 बच्चे में देखने को मिलता है, सात वर्ष का देव बैरागी, जो स्टीवन जोहानसन सिंड्रोम से जूझ रहा था उसे भी मात्र दो दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी. आपको बताते चले की यह एक ऐसी बिमारी है जिसमें कोशिकाओं की मृत्यु के कारण एपीडर्मिस, डर्मिस से अलग होने लगती है। यह सिंड्रोम एक हाइपरसेंस्टिविटी समष्टि माना जाता है जिससे त्वचा एवं म्यूकस मेम्ब्रेन प्रभावित होते हैं। हालांकि अधिकांश मामलों में कारण इडियोपैथी होता है, ज्ञात कारणों में मुख्य श्रेणी के अंतर्गत औषधियां आती हैं, जिसके पश्चात संक्रमण तथा (दुर्लभ रूप से) कैंसर होता हैं।

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काफी ऐसे मरीज भी देखने को मिले जो बेहद गंभीर बिमारियों से ग्रस्त थे लेकिन अनुभवी चिकित्सकों की टीम की निगरानी में आकर ना सिर्फ पीड़ित को स्वास्थलाभ हो रहा है बल्कि माता-पिता के चेहरों पर भी सुकून के भाव नज़र आ रहे है. वहीँ डॉक्टर दीपक छाबड़ा का मुदु स्वभाव तीमारदारों के दिलो में दिलासा पैदा करता है.

 


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