उनके जलसों में लोग दीवानो की तरह तालियां बजाते थे, नाम इतना था की भीड़ जुटाना ज़रा भी मुश्किल नहीं होता था हालाँकि कुछ लोग इनसे तब वाकिफ हुए थे जब कुछ वर्ष पूर्व जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र धरने पर बैठे थे लेकिन कुछ ही दूर इनका मुशायरा चल रहा था. लोगो का आरोप था की इन्होने जामिया के उन छात्रों को नज़रअंदाज़ किया जो #Save_Jamia नामक एक मुहीम चलाकर यूनिवर्सिटी के लिए धरना दे रहे थे.

बात आयी और गयी हो गयी, इसके बाद धड़ाधड़ हुए मुशायरों में इनकी छवि एक मुस्लिम परस्त शायर कमआंदोलनकारी के रूप में सामने आने लगी. इनके कुछ मित्रों की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अच्छी पैठ थी जिस कारण वहां भी तालियों और मुशायरों का एक दौर चला और उस समय काफी चर्चा में आ गए जब इन्होने “खून बोल रहा है” नामक एक मुहीम शुरू की. जिसमे देशभर की जनता से ब्लड डोनेट करने का आह्वान किया गया. काफी संख्या में लोग खून देने पहुंचे। हालाँकि उसमे भी विवाद यह रहा की इन्होने AC गाड़ी में बैठकर ब्लड दिया वहीँ इनके चाहने वालो को सड़क पर लेटकर ही खून देना पड़ा.

जी आज हम बात कर रहे है एक समय प्रसिद्ध शायर रहे इमरान प्रतापगढ़ी की, जो आजकल महाराष्ट्रा में एक मुशायरे के सिलसिले में लाइम लाइट में है. सोशल मीडिया पर इमरान पर यह आरोप लगाया जा रहा है की उन्होंने पैसे लेकर शिवसेना के लिए मुशायरा किया और जिस ईमान और मुसलमान की वो बात करते थे उसे दौलत के आगे भूल बैठे.

एक समय में इमरान प्रतापगढ़ी के परम् मित्र रहे पत्रकार मोहम्मद अनस इस मामले को लेकर कहते है की इमरान ने पूरी मुस्लिम कौम को धोखा में रखा है जिस सोशल मीडिया से लोगों को बनाया था बेवकूफ वही सोशल मीडिया कर रहा है हिसाब, फ़ासिस्ट संगठनों द्वारा हो रही मॉब लिंचिंग में मारे गये मजलूमों ने इनकी अर्थव्यवस्था में चार चाँद लगा दिया। फिर हर छः महीने में नई फ़ॉरचुनर, शाही रहन-सहन, चापलूसों की एक बड़ी जमात इकट्ठा कर ली। अब हाल में जनाब कांग्रेस के बहाने शिवसेना के साथ हैं, उम्मीद करता हूँ कल जनाब चंद सिक्कों की ख़ातिर संघ की गोद में बैठे होंगे।

शिवसेना के कथित समर्थन में हुए मुशायरे को लेकर वैसे तो मुस्लिम समुदाय बुद्धिजीवी वर्ग खासा नाराज़ है लेकिन इस कदम की वो लोग भी आलोचना कर रहे है जो कभी इमरान से कंधे से कन्धा मिलाकर चलते थे ऐसे ही एक शख्स है जावेद प्रतापगढ़ी, जो लिखते है.

भाई साहब जो आपने अपनी सफाई पेश की है ना बहोत कमजोर है जब तुम मंचो से चिल्ला कर कहते थे मैं किसी से नहीं डरता सच बोलता हूँ लोग तालियां बजाते थे एक जुमला था आप का मैं मैं हिम्मत करता हूँ साथ देना मेरा। लोगो नें खूब साथ दिया आपका। तेजगढ से पूरी दुनिया का सफर कराया। तुम्हे तो लिखना भी नहीं आता था सिर्फ पढ़ना जानते थे। याद करो वो सफर के पी कालेज से जो शुरू हुआ किसकी देन थी? एल. बी. सिंह सर की। तुम उनके नहीं हुए। मुझे सर मिलते रहते हैं। याद करो उस सफर में आगे आप की मुलाकात मौलाना मुख्तार ज़िन्होने आप की शायरी में चार चाँद लगा दिया से हुई। किसने माँ वाली नज्म का तोहफा दिया। तब आप कलम पकडना भी नहीं जानते थे। तुम उनके भी ना हो सके। तुम्हारा सफर प्रतापगढ़ से मुंबई शुरू कराने वाले आद्यया प्रसाद उन्मत जी, तुम उनके भी ना हुए। कभी उनका शुक्रिया अदा किया किसी मंच से? कभी नहीं।
तुम्हारे सफर का सबसे प्यारा साथी, तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त, ज़िसे आज दुनिया शहजादा कलीम के नाम से जानती है, क्या किया तुमने उसके साथ? तुम भूखे सोते तो वह भी भूखा सोता। तुम्हारे हर कदम पर तुम्हारे साथ चलता। मुझे याद है जब आये थे तुम ताला में मुशायरा पढने पहली बार, 1500 रूपये में, कलीम तुम्हे एक स्कुटर पर बैठा कर लाया था। क्या किया आपने उसके साथ? जिस दिन उसने शायरी की दुनिया में कदम रखा, तुम उसके खिलाफ हो गये। जान से मारने की धमकी तक दिलवाई। यहां तक दुबई जब वो मुशायरा पढने जा रहा था, ज़ितनी हो सकती थी तुम और तुम्हारे भक्तों ने नीचता दिखाई। मुशायरा ना पढ़ने की धमकी दी। गालियां दिलवाई जब की वो तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त था। उसकी मदद करनी थी तुम्हें लेकिन तुमको खतरा लगने लगा। कौन है तुम्हारा प्रतापगढ में आज दोस्त? किसी के तो बन के रहते तुम। सारे के सारे पुराने दोस्तों में किसके दोस्त हो तुम? ज़रा बताना भाई। तुमने तो सिर्फ मक्करी की है और आज भी वही कर रहे हो।

 

वहीँ इमरान खान अपनी वाल पर लिखते है की

मेरे हिंदुस्तान मैं तेरा अकबर बोल रहा हूँ, पैसा नहीं मिल रहा है इसलिए अब शिवसेना के लिए बोल रहा हूँ। इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने बचाव में एक बेहद कमज़ोर तर्क दे दिया है कि मुसलमानों को हिंदुस्तानी तहज़ीब वाला हिंदू तो पसंद है लेकिन चुनाव के वक़्त वह अपनी क़यादत का नारा लगाते हुए सेक्युलरों को गाली देने लगता है. मतलब भारतीय मुसलमानों को सेक्यूलर हिंदू पसंद है लेकिन वह ख़ुद ऐसा नहीं है।
ख़ैर, जुमा-जुमा चार दिन से राजनीतिक गलियारों में भटक रहे इमरान प्रतापगढ़ी को यह नहीं पता कि 70 साल से हिन्दुस्तान पर हुक़ूमत सेक्यूलर दलों ने ही की है ना कि मुसलमानों की किसी पार्टी ने। और सभी सेक्यूलर पार्टियों को गद्दी मुसलमानों के निर्णायक वोट से ही मिलती है।
कड़वा सच तो यह है कि मुसलमानों ने धर्म के आधार पर बनी पार्टियों को वोट देने से इनकार किया है जिसकी वजह से धर्म के आधार पर बनी दर्जनों पार्टियां पैदा होकर ज़मींदोज़ हो गईं। हुक़ूमत चाहे सेक्यूलर दल की हो या फिर किसी फिरक़ापरस्त पार्टी की, मुसलमान दोनों में पिटता है। मगर इतना पिटने के बावजूद भारतीय मुसलमान सेक्यूलर दलों को ही वोट करता है ना कि उनके उत्पीड़न के सवाल को उठाने वाली किसी हरे रंग की पार्टी को। इसकी ताज़ा मिसाल दिल्ली में हुए नगर निगम के चुनाव हैं। एमसीडी के चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने जामिया नगर और सीलमपुर जैसे मुस्लिम बहुल्य इलाक़ों से अपने उम्मीदवार उतारे लेकिन मुसलमानों ने अपना वोट ओवैसी की पार्टी की बजाय आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवारों को देकर उन्हें जिताया। फिर इमरान प्रतापगढ़ी किस आधार पर मुसलमानों पर सेक्यूलर दलों या हस्तियों के साथ नहीं खड़े होने का आरोप लगा रहे हैं?
इमरान प्रतापगढ़ी के लिए मुश्किल हो जाएगी अगर ओवैसी की पार्टी के चंद समर्थकों के आधार पर वह पूरे मुस्लिम समाज पर आरोप लगाएंगे। यह आरोप इमरान साबित तो नहीं कर सकते मगर एक काम ज़रूर कर सकते हैं। उन्हें चुनाव आयोग की वेबसाइट खंगालने के बाद अपना चेहरा शीशे में देखना चाहिए।
मुस्लिम समाज के बारे में यह ज़हरीला बयान देकर इमरान ने मुसलमानों का बड़ा नुकसान किया है। जो बात उन्होंने कही है, वही बात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ज़माने से हिंदू समाज को समझाने की कोशिश कर रहा है। आरएसएस अपने दुष्प्रचार में काफी हद तक कामयाब है और इमरान के बयान से उनके दुष्प्रचार पर एक मुहर भी लगा दी है।
मुस्लिम समाज को इस आरोप को गंभीरता से लेना चाहिए। अपने निजी फायदे के लिए कोई शख़्स अगर उसे बदनाम कर रहा है तो उसे उसके अंजाम तक पहुचाना चाहिए !

 

वरिष्ठ पत्रकार शाहनवाज़ मालिक इस मामलो को लेकर तीखी आलोचना करते हुए कहते है की इमरान को भीड़ जुटाने की कला मालूम है। वह हल्की तुकबंदी करते हैं और मुस्लिम मुहल्लों में होने वाले मुशायरों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मंच से भला-भुरा कहते हैं। यह एक ट्रिक है और इसके बाद अचानक से भीड़ जुटने लगती है। सियासी दलों के सामने इसी भीड़ को इमरान अपनी संपत्ति के रूप में पेश करते हैं। भीड़ के कुछ नमूने लेकर वो सियासी दलों के दफ़्तरों में चक्कर लगाते हैं और बड़े नेताओं से मुलाक़ात के लिए अप्वाइंटमेंट की कोशिश करते हैं। ऐसी मुलाक़ातों के पीछे मंशा मुसमलानों के वोटों की ख़रीद-फरोख़्त की होती है जो आज़ाद हिन्दुस्तान में मुस्लिम समाज में चल रही एक पुरानी परंपरा है। जितनी जज़्बाती तक़रीर, उतनी बड़ी भीड़ और उसपर उतनी भारी डील।

मुसलमानों का वोट किसी पार्टी को दिलवाने के लिए इमरान सरीखे मुस्लिम चेहरे तरह-तरह के लूले-लंगड़े तर्क गढ़ते हैं। फिलहाल सोशल मीडिया में यह बहस काफी तेज़ है कि इमरान महाराष्ट्र में किसी पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए गए हैं। जब सोशल मीडिया ने मुसलमानों ने पार्टी विशेष के प्रचार की वजह पूछी तो उन्होंने मुसलमानों पर शर्मनाक और सांप्रदायिक टिप्पणी कर दी।

 


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