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दुनियाभर में मुस्लिम वैज्ञानिकों ने जो योगदान दिया उसे एक बड़ी साजिश के तहत नज़रअंदाज कर उनकी उपलब्धियों को दफन करने की कोशिश की गई । इस साजिश में किसी एक मुल्क को ज़िम्मेदार ठहराना बेमानी होगा लेकिन अमेरिका,रूस जर्मनी, ब्रिटेन और फ़्रांस सहित दुनिया के कई बड़े मुल्कों ने मिलकर मुस्लिम वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोजों पर न सिर्फ पर्दा डाल दिया बल्कि उन वैज्ञानिकों की पहचान को भी छिपाए रखा ।

ब्यूरो । मुसलमानों ने विज्ञान के हर क्षेत्र में अपनी खिदमतों को अंजाम दिया है और विज्ञान को मजबूती प्रदान की है। खुद कुरआन में 1000 आयत ऐसी है, जिन का सम्बन्ध वैज्ञानिक क्षेत्र से है। विज्ञान का कोई क्षेत्र ऐसा नही जिसमे मुसलमानों ने अपनी खिदमतों को अंजाम न दिया हो।

मुसलमानों के लिए ज्ञान के क्या मायने हैं, उसे कुरआन ने अपनी पहली ही आयत में स्पष्ट कर दिया था। अतीत में मुसलमानों ने इसी आयत करीमा का पालन करते हुए वह स्थान प्राप्त कर लिया था जिस के बारे में आज कोई विचार नही कर सकता।

मुसलमान ज्ञान के हर क्षेत्र में आगे थे। चाहे उसका सम्बन्ध धार्मिक ज्ञान से हो या आधुनिक ज्ञान से। धार्मिक ज्ञान में वे मुफक्किर-ए-इस्लाम और वलीउल्लाह थे, तो आधुनिक ज्ञान में उनकी गणना दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों में होती थी, यही कारण था कि अल्लाह ने धार्मिक और आधुनिक ज्ञान के कारण उन्हें बुलंदियों पर बिठा दिया था।

तब हम तादाद में कम थे, लेकिन ज्ञान के हुनर-ओ-फन में हमारा कोई सानी नही था। हमारे ज्ञान व कला को देख कर विरोधी तक हमारी प्रशंसा करने के लिए मजबूर हो जाते थे। आज हम करोड़ो में हैं लेकिन ये फन हमारे हाथों से निकलता जा रहा है, क्यूंकि हमारा सम्बन्ध अल्लाह और उसके रसूल से हटता जा रहा है।

बड़ी अजीब बात है कि मुसलमानों ने अपना इतिहास भुला दिया। उसे वह हुनर तो छोड़ो, वह नाम ही याद नही जिनकी वज़ह से आधुनिक विज्ञान ने इतनी प्रगति की है। मुसलमान अतीत में एक सफल इंजिनियर भी रहे। एक चिकित्सक भी रहे। एक उच्च सर्जन भी रहे हैं। कभी इब्न-उल-हैशम बन कर प्रतिश्रवण के सिंहासन पर काबिज हो गये। तो कभी जाबिर बिन हियान के रूप में रसायन विज्ञान का बाबा आदम बन कर सामने आये।

इब्न सीना :

इब्न सीना का पूरा नाम अली अल हुसैन बिन अब्दुल्लाह बिन अल-हसन बिन अली बिन सीना है | इनकी गणना इस्लाम के प्रमुख डाक्टर और दर्शिनिकों में होती है पश्चिम में इन्हें अवेसेन्ना (Avicenna) के नाम से जाना जाता है ये इस्लाम के बड़े विचारकों में से थे, इब्न सीना ने 10 साल की उम्र में ही कुरआन हिफ्ज़ कर लिया था |

बुखारा के सुलतान नूह इब्न मंसूर बीमार हो गये| किसी हकीम की कोई दवाई कारगर साबित न हुई| 18 साल की उम्र में इब्न सीना ने उस बीमारी का इलाज़ किया जिससे तमाम नामवर हकीम तंग आ चुके थे|

इब्न सीना की दवाई से सुल्तान इब्न मंसूर स्वस्थ हो गये| सुल्तान ने खुश हो कर इब्न सीना को पुरस्कार रूप में एक पुस्तकालय खुलवा कर दिया| अबू अली सीना की स्मरण शक्ति बहुत तेज़ थी उन्होंने जल्द ही पूरा पुस्तकालय छान मारा और जरूरी जानकारी एकत्र कर ली| फिर 21 साल की उम्र में अपनी पहली किताब लिखी | अबू अली सीना ने 21 बड़ी और 24 छोटी किताबें लिखीं| लेकिन कुछ का मानना है कि उन्होंने 99 किताबों की रचना की |

उनकी गणित पर लिखी 6 पुस्तकें मौजूद हैं जिनमे “रिसाला अल-जराविया ,मुख्तसर अक्लिद्स, अला रत्मातैकी, मुख़्तसर इल्म-उल-हिय, मुख्तसर मुजस्ता, रिसाला फी बयान अला कयाम अल-अर्ज़ फी वास्तिससमा (जमीन की आसमान के बीच रहने की स्थिति का बयान ) शामिल हैं|

इनकी किताब “किताब अल कानून” चिकित्सा की एक मशहूर किताब है जिनका अनुवाद अन्य भाषाओँ में भी हो चुका है| उनकी ये किताब 19वीं सदी के अंत तक यूरोप की यूनिवर्सिटीयों में पढाई जाती रही | अबू अली सीना की वैज्ञानिक सेवाओं को देखते हुए यूरोप में उनके नाम से डाक टिकट जारी किये गये हैं|

आज हमें स्कूल और कॉलेजों में बताया जाता है कि “मुसलमानों ने जब कुस्तुन्तुनिया को अपने कब्जे में लिया तो वहां साइंस के और ज्ञान विज्ञान के तमाम स्त्रोत मौजूद थे|

अल-बैरूनी

अबू रेहान अल बैरूनी का पूरा नाम अबू रेहान मुहम्मद इब्न अहमद अल बैरूनी है। ये 9 सितंम्बर 973 ई को ख्वारिज्म के एक गाँव बैरून में पैदा हुए। ये बहुत बड़े शोधकर्ता और वैज्ञानिक थे| अल बैरूनी ने गणित, इतिहास के साथ भूगोल में ऐसी पुस्तकें लिखीं हैं, जिन्हें आज तक पढ़ा जाता है। उनकी पुस्तक “किताब अल -हिंद” को बहुत लोकप्रियता प्राप्त है।

इस पुस्तक में अल बैरूनी ने हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों और इतिहास के साथ भारतीय भौगोलिक स्थिति बड़ी ही तहकीक से लिखें हैं। बैरूनी ने कई साल हिन्दुस्तान में रह कर संस्कृत भाषा सीखी और हिन्दुओं के ज्ञान में ऐसी महारत हासिल की कि ब्राह्मण भी आश्चर्य करने लगे।

अल बैरूनी की लिखी पुस्तक “कानून मसूद”, खगोल विज्ञान और गणित की बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है इस पुस्तक में ऐसे साक्ष्य पेश किये गये हैं जो और कहीं नहीं मिलते।

स्वरूप विज्ञान और गणित में अल बैरूनी को महारत हासिल थी इन्होने भौतिकी, इतिहास, गणित के साथ-साथ धर्म, रसायन और भूगोल पर 150 से अधिक पुस्तकें लिखी |

बैरूनी ने ही सब से पहले पृथ्वी को मापा था। अल बैरूनी ने आज से 1000 साल पहले महमूद गज़नवी के दौर में मौजूदा पाकिस्तान आने वाले उत्तरी पंजाब के शहर पिंड, दादन खान से 22 किलोमीटर दूर स्थित नंदना में रुके।

इसी प्रवास के दौरान इन्होने पृथ्वी की त्रिज्या को ज्ञात किया, जो आज भी सिर्फ एक प्रतिशत के कम अंतर के साथ दुरुस्त है। सभी वैज्ञानिक इस बात से हैरत में हैं कि अल – बैरूनी ने आज से 1000 साल पहले जमीन की माप इतनी सटीकता के साथ कैसे कर ली ?

अल-बैरूनी ने ही बताया कि पृथ्वी अपनी अक्ष (axis) पर घूम रही है और ये भी स्पष्ट किया फव्वारों का पानी नीचे से ऊपर कैसे जाता है।

अल तूसी :

इनका पूरा नाम अल अल्लामा अबू जाफर मुहम्मद बिन मुहम्मद बिन हसन अल तूसी है। ये सातवीं सदी हिजरी के शुरू में तूस में पैदा हुए। इनकी गणना इस्लाम धर्म के बड़े साइंसदानो में होती है। इन्होने बहुत सारी किताबे लिखीं। जिनमे सब से अहम “शक्ल उल किताअ” है। यह पहली किताब थी जिसने त्रिकोणमिति को खगोलशास्त्र से अलग किया।

अल तूसी ने अपनी रसद गाह में खगोलीय टेबल बनाया। जिससे यूरोप ने भरपूर फायदा उठाया। अल तूसी ने बहुत से खगोलीय समस्याओ को हल किया और बत्लूम्स से ज्यादा आसान खगोलीय मानचित्र बनाया। उन्ही की मेहनत और परिश्रम ने कूपर निकस को सूरज को सौर मण्डल का केंद्र करार देने में मदद दी। इससे पहले पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता था।

इन्होने आज के आधुनिक खगोल का मार्ग प्रशस्त किया। इसके साथ उन्होंने ज्यामिति के द्रष्टिकोण में नये तथ्य शामिल किये। मशहूर इतिहासकार शार्टन लिखता है – “तूसी इस्लाम के सब से महान वैज्ञानिक और सबसे बड़े गणितज्ञ थे।”

इसी मशहूर वैज्ञानिक ने त्रिकोणमिति की बुनियाद डाली और उससे सम्बंधित कई कारण भी बतलाये। खगोल विज्ञान की पुस्तकों में “अलतजकिरा अलनासरिया ” जिसे “तजकिरा फी इल्म नसख” के नाम से भी जाना जात है। खगोल शास्त्र की एक मशहूर किताब है। जिसमें इन्होने ब्रह्मांड प्रणाली में हरकत की महत्वता, चाँद का परिसंचरण (Rotation) और उसका हिसाब, धरती पर खगोलीय प्रभाव, कोह, रेगिस्तान, समुन्द्र, हवाएं और सौर प्रणाली के सभी विवरण स्पष्ट कर दिए। तूसी ने सूर्य और चंद्रमा की दूरी को भी स्पष्ट किया और ये भी बताया कि रात और दिन कैसे होते हैं।

जाबिर बिन हियान -मुस्लिम रसायन शास्त्री:

जाबिर बिन हियान, जिन्हें इतिहास का पहला रसायन शास्त्री कहा जाता है। उसे पश्चिमी देश में गेबर (Geber) के नाम से जाना जाता है। इन्हें रसायन विज्ञान का संस्थापक माना जाता है। इनका जन्म 733 ईस्वी में तूस में हुई थी।

जाबिर बिन हियान ने ही एसिड की खोज की। इन्होने एक ऐसा एसिड भी बनाया जिससे सोने को भी पिघलाना मुमकिन था। जाबिर बिन हियान पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पदार्थ को तीन भागों – वनस्पति, पशु और खनिज में विभाजित किया|

इसी मुस्लिम साइंसदान ने रासायनिक यौगिकों जैसे कार्बोनेट, आर्सेनिक, सल्फाइड की खोज की। नमक के तेजाब, नाइट्रिक एसिड, शोरे के तेजाब और फास्फोरस से जाबिर बिन हियान ने ही दुनिया को परिचित कराया। जाबिर बिन हियान ने मोमजामा और खिजाब बनाने का तरीका खोजा और यह भी बताया कि वार्निश के द्वारा लोहे को जंग से बचाया जा सकता है|

जाबिर बिन हियान ने 200 से अधिक पुस्तकें रचना में लायीं। जिनमें किताब अल रहमा, किताब-उल-तज्मिया, जैबक अल शर्की, किताब-उल-म्वाजीन अल सगीर को बहुत लोकप्रियता प्राप्त है। जिनका अनुवाद विभिन्न भाषाओँ में हो चुका है।

अल जज़री :

अल जजरी अपने समय के महान वैज्ञानिक थे। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इन्होने अपार सेवाएँ प्रदान की। इस महान वैज्ञानिक ने अपने समय में इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इन्कलाब बरपा कर दिया था।

इनका सबसे बड़ा कारनामा ऑटोमोबाइल इंजन की गति का मूल स्पष्ट करना था और आज उन्हीं के सिद्धांत पर रेल के इंजन और अन्य मोबाइलों का आविष्कार संभव हो सका। अल-जजरी ने ही सबसे पहले दुनिया को रोबोट का मंसूबा अता किया।

इन्होने ही पानी निकालने वाली मशीन का आविष्कार किया। और कई घड़ियों की भी खोज की जिनमे हाथ घड़ी, कैसल घड़ी, मोमबत्ती घड़ी और पानी घड़ी भी शामिल हैं |

इब्न अल हैशम :

इब्न अल हैशम का पूरा नाम अबू अली अल हसन बिन अल हैशम है। ये ईराक के एतिहासिक शहर बसरा में 965 ई में पैदा हुए। इन्हें भौतिक विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान में महारत हासिल थी।

इब्न अल हैशम अपने दौर में नील नदी के किनारे बाँध बनाने चाहते थे। ताकि मिश्र के लोगों को साल भर पानी मिल सके। लेकिन अपर्याप्त संसाधन के कारण उन्हें इस योजना को छोड़ना पड़ा। लेकिन बाद में उन्हीं की इस योजना पर उसी जगह एक बाँध बना। जिसे आज असवान बाँध के नाम से जाना जाता है |

अतीत में माना जाता था कि आँख से प्रकाश निकल कर वस्तुओं पर पड़ता है, जिससे वह वस्तु हमें दिखाई देती है। लेकिन इब्न अल हैशम ने अफलातून और कई वैज्ञानिकों के इस दावे को गलत साबित कर दिया और बताया कि जब प्रकाश हमारी आँख में प्रवेश करता है तब हमे दिखाई देता है। इस बात को साबित करने के लिए इब्न अल हैशम को गणित का सहारा लेना पड़ा।

इब्न अल हैशम ने प्रकाश के प्रतिबिम्ब और लचक की प्रकिया और किरण के निरक्षण से कहा कि जमीन की अन्तरिक्ष की उंचाई एक सौ किलोमीटर है। इनकी किताब “किताब अल मनाज़िर” प्रतिश्रवण के क्षेत्र में एक उच्च स्थान रखती है। उनकी प्रकाश के बारे में की गयी खोजें आधुनिक विज्ञान का आधार बनी। इब्न अल हैशम ने आँख पर एक सम्पूर्ण रिसर्च की और आँख के हर हिस्से को पूरे विवरण के साथ अभिव्यक्ति किया।

जिसमें आज की आधुनिक साइंस भी कोई बदलाव नही कर सकी है। इन्होने आँख का धोखा या भ्रम को खोजा जिसमे एक विशेष परिस्थिति में आदमी को दूर की चीजें पास और पास की दूर दिखाई देती हैं। प्रकाश पर इब्न अल हैशम ने एक परिक्षण किया। जिसके आधार पर अन्य वैज्ञानिकों ने फोटो कैमरे का आविष्कार किया।

उनका कहना था कि “अगर किसी अंधेरे कमरे में दीवार के ऊपर वाले हिस्से से एक बारीक छेंद के द्वारा धूप की रौशनी गुजारी जाये तो उसके उल्ट अगर पर्दा लगा दिया जाये तो उस पर जिन जिन वस्तुओं का प्रतिबिम्ब पड़ेगा वह उल्टा होगा ” उन्होंने इसी आधार पर पिन होल कैमरे का आविष्कार किया।

इब्न अल हैशम ने जिस काम को अंजाम दिया। उसी के आधार पर बाद में गैलीलियो, कापरनिकस और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों ने काम किया। इब्न अल हैशम से प्रभावित होकर गैलीलियो ने दूरबीन का आविष्कार किया। इब्न अल हैशम की वैज्ञानिक सेवाओं ने पिछले प्रमुख वज्ञानिकों के चिराग बुझा दिए। इन्होने इतिहास में पहली बार लेंस की आवर्धक पावर की खोज की। इब्न अल हैशम ने ही यूनानी दृष्टि सिद्धांत (Nature of Vision) को अस्वीकार करके दुनिया को आधुनिक दृष्टि दृष्टिकोण से परिचित कराया।

जो चीजें इब्न अल हैशम ने खोजी। पश्चिमी देशों ने हमेशा उन पर पर्दा डालने की कोशिस की। इब्न अल हैशम ने 237 किताबें लिखीं। यही कारण है कि अबी उसैबा ने कहा कि वो कशीर उत तसनीफ (अत्यधिक पुस्तक लिखने वाले) थे।

अबू अल कासिम अल जहरवी -सर्जरी का संस्थापक:

अबू कासिम बिन खल्फ बिन अल अब्बास अल जहरवी 936 में पैदा हुए। मगरिब (पश्चिम) में इन्हें अबुलकासिस (Abulcasis) के नाम से जाना जाता है इनकी पुस्तक “किताब अल तसरीफ” चिकित्सा के क्षेत्र की महान पुस्तक है जिसमें चिकित्सा विज्ञान के सभी कलाओं का उल्लेख किया गया है।

अल जहरवी ने ही सर्जरी की खोज की और इतिहास में पहली बार सर्जरी का प्रयोग कर दुनिया को इस नये फन से वाकिफ कराया।

अल किंदी :

इनका पूरा नाम याकूब इब्न इशहाक अल-किंदी है। इनके पिता कूफा के गवर्नर थे। इन्होने प्रारंभिक शिक्षा कूफ़ा ही में प्राप्त बाद में बगदाद चले गये।

इनकी गणना इस्लाम के सर्वोच्च हुकमा और दार्शनिकों में होती है। इन्हें गणित, चिकित्सा और खगोल विज्ञान में महारत हासिल थी।

अल किंदी ने ही इस्लामी दुनिया को हकीम अरस्तू के ख्यालों से परिचित कराया और गणित, चिकित्सा विज्ञान, दर्शन और भूगोल पर 241 उत्कृष्ट पुस्तकें लिखी। जिनमें उनकी पुस्तक “बैत-उल-हिक्मा (House of Wisdom) को बहुत लोकप्रियता प्राप्त है।

इनपुट : इस्लाम और विज्ञानं तथा माई जेविया डॉट कौम से भी

साभार:लोकभारत डॉट कॉम


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