सौ साला गिरोह

1सौ साला गिरोह  – भाग 1

तो ककहरा-ए-कहानी कुछ यूं बावस्ता हुई कि मुगल निथर गये थे और अंग्रेज छक गये थे और रुकते तो अंगरेजियत की नसल संकर होने का खतरा फजां में रवां-दवां था यूं कि जब तक अंग्रेज नसल सुधार रहे थे तब तक कोई गिला न था पर गोरी मेमें नेटिवो के साथ नेटियाने लगे तो आंग्ल खून में करिया-सांवर खून घुस आये तो ये कौन नदी संगम हुआ भला ?

देश के भीतर मन में खित्ते का बांट-बखरा तय था मन में टू, थ्री नेशन का भरोसा जन को था ही मुगलिया इस्लाम का राज अपना काम कर चुका था बस घर की बागडोर बदलने पर अपना मालो-जर और जमीन संभालनी थी ! दल-दल कर चूरा हुए दलित अलग राष्ट्र चाहते थे पर एक तर्क ये भी था कि पाकिस्तान के नाम पर कन्वर्ट दलित ही तो पाकिस्तान बना लिये और दलितस्तान दिया तो बचेगा क्या ?

सो दिन गुजरने के साथ अंग्रेज मालो-असबाब समेटने लगे दो सौ बरस राज के बाद सामान समेटने की तैयारी कोई 35-40 बरस पहले करनी ही पड़ती है सो कर रहे थे बरास्ता-ए-आजादी का ख्याल-ओ-परचम निगूं होता रहा दीवानावार परवाने निसार हुए जाते थे….
छापेखाने रवां थे रिसाले, किताबें,नक्शे दबादब फरमों में चढे जाते थे !

ले-भग्गुओं की जमात को जब छापेखाने समझ आये तो अचानक तहखाने के अंधेरों से मिथककार शब्दों का तागा बुनने लगे तमाम कुंठाऐं छपास में छपा-छप होने लगीं विलियम जोंस ने इतनी तो आखें खोल ही दी कि अधबानर-अधकपार भी सारी चंडूखाने की छापेखाने से होते हुए किताबों तक उतार लाए ! हर जमाने का सच यही है कि हकीकत की खूनमखून रगड़ाई से जेहनी अय्याशी में सूकून तलाशा जाय, ठगी पर पाबंदी नाफिज हो चुकी थी विलियम बैंटिक और राजा राम मोहनराय की बदौलत सो ठग बटमार लुच्चे लफाड़ी गिरोह छापाखाना पकड़ लिये और यहां से शुरुआत हुई किताबजनी की ! ये रहजनी का नया रुप अकादमिक अय्यारी थी “सौ साला गिरोह” की संगे-बुनियाद किताबजनी से पड़ी तो इंशाअल्लाह ईमारत आसमान की बलंदियों तक जानी तय थी !

इतिहास-भूगोल-ज्योतिष-खगोल अजी सब गोलमगोल, कहते ह ना- “गोला-गोला बने गोला ढंग से बने !” इस गोले में मिलाने वाले भी वे बनाने वाले भी वे और मिलावट तो बाप-दादाओं से विरसे में मिली थी खून में समायी थी और अंग्रेज हाकिम को इससे कोई गरज-मनाही न थी सो गिरोह की बन आयी बाहर छटे-छूटे मंदिर-नदियां-प्राचीर-खंडहर थे ही और आस्था की चींटियों को मीठा भर डालना था !

भाई कबीर-गालिब-मीर को एक तरफ रखिए उनकी बेचैनी आ गयी और दिमाग में कुछ ऐसी घुसी कि जीन में समा गयी उसपे शको-शुब्हा नहीं है पर बाकी का इतिहास इन्हीं छापेखानों में गढ़ा गया और मनमाफिक गढ़ा गया अब मुझे तो यही इलहाम होता है होता है तो होय ! आपकी सेहत को क्या फरक पड़ता है ? शक मुझे है तो होता रहे इसका ईलाज हकीम लुकमान के पास भी न था आपको अपने भरोसे पर भरोषा करना चाहिए !

(तो समझ आया कि अचानक पड़ा छापा वो भी गिरोह का और छापेखाने पे बरामदी तो कुछ न थी लूट के ख्वाब थे पूरे न हुए तो विधान-रवायत बनाकर छप्पा-छप्पा परोस दिये गये )

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