saeem zahoor

यूं तो पाकिस्तान से लेकर हिन्दुस्तान तक सूफी म्यूजिक की धूम है एआर रहमान की शायद ही ऐसी कोई फिल्म हो जिसमे सूफी कलाम का टच ना हो. यह वो संगीत है जो दिल को छूता है और अन्दर तक पैठ बनता चला जाता है. अगर सूफी संगीत के दीवाने है तो ज़ाहिर सी बात है आपको रहमान या फिर नुसरत की कवाली सुनकर दिल में सूफी संगीत की दिलचस्पी जगी होगी. हम किसी भी सूफी गायक की आपस में तुलना नही कर सकते. यह कहना बहुत मुश्किल होगा की नुसरत और रहमान में कौन अधिक अच्छा है अगर तुलना करने बैठ गये तो रूहानियत का वो जादू खत्म सा हो जायेगा तो इन दोनों के संगीत में मिलता है.

आज हम ऐसे ही एक और सूफी सिंगर की बात करेंगे जिनकी आवाज़ दिल का आवाज़ होती है जिन्होंने बाबा बुल्ले शाह को नही देखा .. तो इन्हें देख लो.

पंजाब की गलियों में पैरो में घुँघरू बाँध हाथ में तुम्बी लिए, चमकीले कपड़ें सिर पर पगड़ी बांधे अगर कोई शख्स औखें पैंदे लम्बियां रावां इश्क दियां …गाता हुआ मिल जाये जिसकी आवाज़ एक बार सुनने में ही दिल को चीरती हुई निकले तो समझलो आपने साईम ज़हूर से मिलकर कर ली है. जो अपनी मस्ती में चूर अल्लाह हु का जाप जपे जा रहे है. बाबा बुल्ले शाह की सीरत पर चलते चलते खुद बाबा साहब जैसे दिखने लगे है.

भारत पाकिस्तान के बटवारे से 10 वर्ष पहले पंजाब के साहिवाल क्षेत्र में जन्मे साई जब छोटे से थे उन्होंने एक ख्वाब देखा था की दरगाह पर एक हाथ उन्हें इशारा करते हुए बुला रहा है बस यह सपना देखना था और साईं ज़हूर की आँखों की नींद उड़ गयी घर वाले भी परेशान हुए की आखिर साईं सोता क्यों नही हकीम वैध सब को दिखाया लेकिन आँखों में नींद ना आती थी किसी फ़कीर ने कहा की उसी दरगाह पर ले जाओ जहाँ साईं ने हाथ देखा था लेकिन दरगाह की पहचान थी किसकी दरगाह देखि इसकी पहचान ना थी.. सो माँ-बाप हाथ पकड़कर एक-एक दरगाह घुमाते फिरते .. साईं से पूछते क्या यही दरगाह ख्वाब में देखि थी ..? जवाब मिलता नही .. कई साल इसी में गुज़र गये पंजाब से लेकर इस्लामाबाद सिंध से लेकर लाहौर तक की सभी दरगाह घुमा डाली लेकिन वही दरगाह नही मिली जो चाहिए थी.. घूमते घूमते पाकपत्तन में बाबा फरीद गंजेशक्र की दरगाह पर पहुंचे जहाँ उन्हें किसी ने नाम से बुलाया साईं ने तुरंत दरगाह पहचान ली जो उन्होंने ख्वाब में देखि थी ..बस यही से रूहानियत का सफ़र शुरू हो गया.

वही सबसे ख़ास बात यह रही की खुदा ने साईं ज़हूर की आवाज़ को वो खासियत बख्शी है जो सुनने के बाद दिल में एक अपनी जगह बना लेती है और उस जगह में वो सूफी आवाज़ के सिवा कुछ भी फिट नही बैठता. अपने एक इंटरव्यू में साई ज़हूर ने बताया की एक बार उन्होंने कुछ जापानियों के सामने बुल्ले शाह बाबा के कलाम की प्रस्तुती दी जिसे सुनकर दो जापानियों ने इस्लाम कुबूला और मुस्लिम बन गये

खालिश पंजाबी में और खासतौर पर बाबा बुल्ले शाह के कलाम पढने वाले साईं ज़हूर को जब कोक स्टूडियो ने दुनिया भर के सामने परिचय करवाया तो इनके और सूफी कलाम के चाहने वालो की जैसे बाढ आगयी अब तक हमने किसी प्रोफेशनल सिंगर को ही सूफी कलाम गाते हुए सुना था ..चाहे वो रहमान हो नुसरत हो राहत हो सुखविंदर हो वडाली बंधू हो लेकिन जब एक असल सूफी के मुंह से दिल की आवाज़ सुनी तो रूहानियत के सागर में डूबने पर मजबूर हो गये जिसमे डूबने पर ही पार लगा जा सकता है.

यह वो विडियो है जो कोक स्टूडियो ने लगाकर ..दीवानों की लाइन लगा दी ..

वैसे हमारी सलाह है की साईं ज़हूर की आवाज़ तब बहुत गहराई तक असर करेगी जब आपकी थोड़ी बहुत पंजाबी की समझ हो लेकिन कहते है की संगीत की कोई जुबां नही होती इनकी आवाज़ में वो जादू है की वो लोग भी इनकी चहेतों की लिस्ट में शामिल है जिन्हें पंजाबी समझ नही आती.

अल्लाह हु ..अल्लाह हु करते करते कब ये दिल में जगह बना लेते है पता भी नही चलता सुकून वो जो असल कलाम सुनने में मिलती .. बीबीसी के ‘बेस्ट वौइस् ऑफ़ दी ईयर 2006’ नवाज़े जा चुके साईं ज़हूर ने अपनी पहचान ही बुल्ले शाह बाबा के इस कलाम से बनाई है जिसमे वो इश्क की लम्बी और कठिन राहो का ज़िक्र कर रहे है.

जल्दी ही लेख का दूसरा भाग प्रकाशित किया जायेगा पसंद आया हो तो कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताये


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