नई दिल्ली। एटम बम वाले गुंडे, वो मुल्क जिनके पास एटम बम तो है लेकिन उसे सहेजने और उसके सही इस्तेमाल की समझ नहीं है। ये वो मुल्क हैं जिन्होंने परमाणु जगत के कालेबाजार से तकनीक और यूरेनियम हासिल करके परमाणु बम तो बना लिया लेकिन उससे होने वाले विनाश की गंभीरता से नावाकिफ हैं। एटमी ताकत से लैस ये मुल्क अक्सर अपने पड़ोसियों और दूसरे मुल्कों को एटम बम का रौब दिखाते हैं। उन्हें धमकाते रहते हैं। हमारा पड़ोसी पाकिस्तान अक्सर हमें परमाणु हमले की धमकी देता रहता है। लेकिन इस बार उसने खाड़ी की लड़ाई में टांग अड़ाई है। सऊदी अरब और ईरान के बीच छिड़े विवाद में कूदते हुए पाकिस्तान ने कहा है कि वो ईरान का नामोनिशान मिटा देगा। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल रहील शरीफ ने कहा कि अगर ईरान ने सऊदी अरब को डराने-धमकाने की कोशिश की, उसकी आजादी खतरे में डाली तो पाकिस्तान ईरान को दुनिया के नक्शे से मिटा देगा।

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ये लफ्ज बेहद कड़े थे। ये बात दुनिया जानती है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब में तगड़ा याराना है। लेकिन एक सेनाध्यक्ष अगर अपने पड़ोसी को ऐसी धमकी देगा तो इसके अर्थ साफ हैं कि पाकिस्तान अपनी परमाणु ताकत पर न सिर्फ इतरा रहा है बल्कि उसके बल पर धमका भी रहा है, डरा रहा है। जानकारों की मानें तो पाकिस्तान की सऊदी अरब पर कृपादृष्टि के पीछे एक खुफिया डील है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई सऊदी अरब की सेना को स्पेशल ट्रेनिंग देती है।

 दुनिया ये भी जानती है कि पाकिस्तान की फौज सऊदी अरब के राजसी घराने को सुरक्षा देती है। किंग सुल्तान और उनके कुनबे को हर डर से बचाती है। लेकिन दुनिया शायद ये नहीं जानती कि पाकिस्तान के परमाणु बम के पीछे जहां चीन की तकनीक है वहीं सऊदी अरब का पैसा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 1974 से ही पाकिस्तान के परमाणु बम के प्रोजेक्ट पर सऊदी अरब डॉलर लगा रहा है। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत अस्सी के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने की थी। कहा तो यहां तक जाता है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक ने जब सऊदी अरब का दौरा किया था तो ये कहा था हमारी कामयाबी दरअसल आपकी कामयाबी है।

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच परमाणु ताकत की ये खुफिया डील नब्बे के दशक में बेनरजीर भुट्टो के दौर में भी जारी रही। और तो और कहा तो ये भी जाता है कि 1998 के दौर में भारत से मुकाबले के लिए जब पाकिस्तान किसी भी तरह परमाणु बम फोड़ कर परीक्षण करने के लिए पसीना बहा रहा था, उस वक्त भी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने सऊदी अरब के किंग को हर जानकारी दी थी। यहां तक की बलोचिस्तान के चेंगाई परीक्षण स्थल में परमाणु बम का परीक्षण करने से ऐन पहले खुद शरीफ ने किंग को खबर तक दी थी। और परीक्षण के बाद खुद शरीफ सऊदी अरब के दौरे पर गए और उस वक्त के राजा फहद को सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान का समर्थन करने पर शुक्रिया दिया। बाद में जब सऊदी अरब के रक्षा मंत्री और प्रिंस सुल्तान पाकिस्तान आए तो उन्हें शरीफ खुद बेहद खुफिया कहूटा रिसर्च लैब के दौरे पर अपने साथ ले गए। और वहां पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान ने उन्हें परमाणु बम की जानकारी दी। ये वही अब्दुल कादिर खान है जिसे पाकिस्तान के परमाणु बम का पिता कहा जाता है और ये वही अब्दुल कादिर खान है जिसके माथे पर परमाणु बम की तस्करी करने, दूसरे मुल्कों को चोरी छिपे देने के संगीन इल्जाम भी हैं।

1998 से ही पश्चिमी मुल्क और खुफिया एजेंसियां ये सोचती रही हैं कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच ये समझदारी भी बन चुकी है कि अगर खाड़ी के मुल्कों पर आफत आती है तो पाकिस्तान सऊदी अरब को परमाणु बम और उसकी तकनीक बेच देगा। हालांकि, दोनों ही मुल्क ऐसी किसी भी समझदारी से इनकार करते रहे हैं।

लेकिन ये नापाक रिश्ते बार बार बेनकाब होते रहे हैं। 2003 में globalsecurity.org नाम की वेबसाइट के दावे ने दुनिया को चौंका दिया, उसने बताया कि पाकिस्तान और सऊदी अरब ने बाकायदा खुफिया समझौता किया है जिसके मुताबिक सस्ते तेल के बदले पाकिस्तान उसे परमाणु हथियार देगा। 2006 में जर्मनी की एक पत्रिका Cicero ने तो यहां तक दावा किया कि 2003 से ही सऊदी अरब को पाकिस्तान मिसाइलें और परमाणु हथियार हासिल करने में मदद दे रहा है। पत्रिका ने दावा किया कि सैटेलाइट की तस्वीरों से साफ पता चल रहा है कि सऊदी अरब की राजधानी रियाद के दक्षिण में अल-सुलायिल नाम की जगह है जहां पर जमीन के नीचे एक पूरा शहर बनाया गया है, इस शहर में बाकायदा पाकिस्तान की परमाणु मिसाइल गौरी का स्टॉक रखा गया है।

जाहिर है अब समझा जा सकता है कि आखिर पाकिस्तान और सऊदी अरब का रिश्ता क्या कहलता है। ये रिश्ता पैसे का है, ये रिश्ता चोरी छिपे हथियारों को बनाने का है। और इसी वजह से पाकिस्तान सऊदी अरब की खातिर नाके बल खड़े होने को भी तैयार रहता है। इसीलिए उसने ईरान को नक्शे से मिटा डालने की धमकी तक दे डाली। ये एकता सुन्नी एकता भी है, पाकिस्तान में सुन्नी बहुसंख्यक हैं, सऊदी अरब में सुन्नियों का बोलबाला है, वहीं ईरान शिया बहुल है। ईरान को मिटा देने की धमकी का ईरान ने प्रतिरोध किया, तेवर कड़े कर लिए और सऊदी अरब से उसके रिश्ते और बिगड़ गए।

सऊदी ने एक शिया मौलवी को सूली पर चढ़ा दिया था, जिससे ईरान खफा था। तेहरान में सऊदी के दूतावास पर जमकर पथराव तक किया गया, दोनों देशों ने राजनयिक रिश्ते तोड़ दिए। सऊदी अरब ने ईरानियों के मक्का जाने पर पाबंदी लगा दी। उसी के बाद पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सेनाध्यक्ष रहील शरीफ को लिया और सऊदी अरब के किंग सलमान से मिले। और इसके बाद उन्होंने रुख किया सीधे ईरान का, प्लेन में ही शरीफ के विदेश मामलों के विशेष सहायक तारिक फतेमी, जनरल रहील शरीफ के साथ विशेष मंत्रणा होती रही। शायद नवाज शरीफ ने अपने जनरल को शांत किया। ईरान को नक्शे से मिटा देने की उनकी धमकी के साइड इफेक्ट्स समझाए और बिना क्रोध ईरानी नेताओं से मिलने के लिए मनाया।

तेहरान में पाकिस्तानी कुनबे का उतना गर्मजोशी से स्वागत नहीं हुआ। नवाज और रहील शरीफ की मुलाकातें हुईं ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी और उपराष्ट्रपति इशाक जहांगीरी से और फिर आए शहद में लिपटे दो बयान। पहला बयान पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ ने दिया। नवाज ने कहा कि सऊदी अरब और ईरान के बीच मध्यस्थता करने का पाकिस्तान को फख्र है। हमने 1997 में भी दोनों के बीच रिश्ते सामान्य बनाने में कामयाबी पाई थी, अब भी हम वही कोशिश कर रहे हैं। इसके बाद दूसरा बयान आया पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ का। राहिल शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान के लिए ईरान बेहद अहम मुस्लिम पड़ोसी मुल्क है। पाकिस्तानी अवाम और ईरान के लोगों का रिश्ता पुराना है।

साफ है पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब को नाराज करना नामुमकिन है लेकिन ईरान से दुश्मनी भी आसान नहीं। वो भी तब जब इरान के परमाणु कार्यक्रम की खबरें भी बीच बीच में सामने आती रही हैं। दुनिया के टॉप टेन परमाणु ताकत वाले देशों में ईरान भी शामिल हो चुका है। और इसी वजह से पाकिस्तान जो उस लिस्ट में 6ठें नंबर पर है। उसने बीच का रास्ता अपनाया। सऊदी अरब को बचाया और ईरान को मनाया। ये पाकिस्तान का ही खेल है और इसलिए उसे कहा जा रहा है एटम बम वाला गुंडा। (ibnlive)


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