पृथ्वी दिवस की वर्षगांठ पर यू.ए.ई. ने एक बयान जारी करते हुए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से निवेदन किया कि वे अपने उत्तरदायित्व को निभाते हुए इजराइल पर जोर डालें और उसको फिलिस्तीनी ज़मीन पर सैन्य कब्जे और वहां पर अपनी बस्तियों को बनाने से रोके।

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यू.ए.ई. ने अपने बयान में कहा: जब तक फिलिस्तीन को स्वतंत्रता नहीं मिलती और और क़ुद्स उसकी राजधानी नहीं बन जाता, शांति नहीं बन पाएगी।

सालों पहले यहूदी शासन ने ३१ मार्च १९७६ में फिलिस्तीन के “अल-जलीलह” नामी छेत्र में वहां की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके उसे यहूदी मुहाजिरों को सौंप दिया था। जलीलह हमेशा से ही बेहतरीन हवा और पानी के होने के कारण क़ब्ज़ा किये हुए फिलिस्तीन का हरा भरा छेत्र रहा है और इसी कारण १९४८ से ही, कि जब फिलिस्तीन पर इजराइल का क़ब्ज़ा हुवा, यह छेत्र यहूदी कब्जेदारों की नज़रों में रहा है, और अंततः यहूदी शासन के अधिकारियों ने इस छेत्र के कुछ हिस्सों पर क़ब्ज़ा करके और उसे यहूदियों के हवाले करके अपनी लम्बे समय की इच्छा को पूरा कर ही लिया।

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उसी साल ३० मार्च को फिलिस्तीनी कार्यकर्ताओं ने विरोधी प्रदर्शन की अपील की और फिलिस्तीन की जनता ने भी इन विरोधी प्रदर्शनों में भाग लिया। क़ुद्स में स्थित इजराइली सेना ने कम से कम ६ फिलिस्तीनियों को शहीद कर दिया और १०० से भी अधिक लोगों को घायल कर दिया और सैकड़ों फिलिस्तीनी गिरफ्तार भी हुए।

इस ओर सालों से, क़ब्ज़ा किये हुए फिलिस्तीनी छेत्र के और फिलिस्तीन के पश्चिमी छोर पर स्थित फिलिस्तीनी, ग़ाज़ा , पुरबी क़ुद्स और दुसरे फिलिस्तीनी शरणार्थी एकजुट होकर यहूदी शासन के इस अमानवीय कार्य का विरोध कर रहे हैं और अपने ऊपर होने वाले ज़ुल्म को विश्व तक पहुचा रहे हैं। (hindkhabar)

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