इजरायल की हमेशा से यही विशेषता रही है कि वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दूसरे लोगों को तबाह कर देता है।

बता दे कि इजरायल को अपने हित सबसे अधिक प्रिय हैं। उसके हितों के रास्ते में जो भी आएगा उसे तबाह करना उसकी विशेषता रही है। इजरायल के गठन से पहले यहूदी बड़ी संख्या मे यूरोप में रहते थे और आज भी अच्छी खासी तादाद यूरोप में हैं। लेकिन उनकी एक बड़ी संख्या आज अमेरिका में रहती है, यूरोप में उन्हें जब ईसाइयों से परेशानियों का सामना करना पड़ा तो उन्होंने यूरोप से दूर एक ऐसी दुनिया की खोज की जो बिल्कुल नवीन थी जहां उनका कोई प्रतियोगी नहीं था इसलिए अमेरिका पर उन्होने बड़ी सरलता से अपना कब्जा जमा लिया।

इजरायलियो की बुद्धिमानता से कौन इनकार कर सकता है, यहूदियों को हमेशा अपनी बुद्धि पर गर्व रहा है। उन्हें इस बात का सदियों से अनुभव रहा है कि बुरी से बुरी स्थिति में भी अपनी पहचान छिपा कर कैसे जीवित रह सकते हैं। अगर किसी राष्ट्र के बारे में जानना हो तो उसे यहूदी राष्ट्र के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए।

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बहुत बुद्धिमान होने के कारण वह हर स्थान और हर जगह पर अपनी जरूरत को साबित करने में सफल हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान में अज़ाक न्यूटन से लेकर आईन स्टाईन तक अधिकांश बड़े वैज्ञानिक यहूदी ही रहे हैं। इसी बुद्धि की वजह से उन्होंने इस दुनिया में पर्याप्त सम्मान पाया, वास्तव मे ज्ञानि व्यक्ति का सम्मान हमेशा होता रहा है चाहे उसका संबंध किसी भी राष्ट्र या जाति से हो। लिकन यहूदियों को लेकर एक विशेष बात यह है कि वह जिस थाली में खाते हैं छेद भी उसी मे करते है।

उदाहरण स्वरूप जर्मनी आपके सामने है, उन्होंने अपनी बुद्धि के बल पर पूरे जर्मन के लोगों को एक तरह से गुलाम बना लिया था, इसी बात ने हिटलर को इस बात की ओर आकर्षित किया कि जर्मन राष्ट्र को यहूदियों के चंगुल से किस प्रकार निकाल जाए। हिटलर ने यहूदियों के साथ जो अत्याचार किया हम उसकी निंदा करते हैं। किसी जाति से इस प्रकार प्रतिशोध नहीं लिया जाता कि सभी लोगों को समाप्त कर दिया जाए। वास्तव मे हिटलर का यह काम मानवता के नाम पर एक धब्बा है।

Theodor Herzl जो इजरायलवाद का संस्थापक है, जिसने यहूदी राष्ट्र के लिए एक राज्य का सपना देखा। उसने 1896 मे प्रकाशित होने वाली अपनी विश्वप्रसिद्ध किताब Der Judenstaat में इजरायल के लिए एक मातृभूमि का सिद्धांत पेश किया, जिस सिद्धांत के अंतर्गत फिलिस्तीन में 1948 में इजरायल नाम के एक साम्राज्य की नींव रखी गई।

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यहूदी राज्य की नींव रखने के रास्ते में पहले उस्मानिया खिलाफत आड़े आई, उसमानी खिलाफत को किस प्रकार किनारे लगाया गया वह इतिहास का हिस्सा है, प्रथम विश्वयुद्ध ही इसलिए हुआ ताकि Ottomon empire (उस्मानी ख़िलाफ़त) समाप्त की जाए और इजरायल राज्य के लिए मार्ग प्रशस्त हो सके, 1917 में तत्काल घोषणा के चलते फिलीस्तीन को ब्रिटेन ने अपने कब्जे में ले लिया।

अंतः धीरे धीरे सारी दुनिया से यहूदियों को लाकर यहाँ बसाया गया इस प्रकार 1948 में यहूदी राज्य की नींव पड़ी। इजरायल ने शुरुआत से ही स्थानीय आबादी फिलिस्तीनीयो के साथ अत्याचार जारी रखा और अब निरंतर फिलिस्तीनियों को जबरदस्ती उन्हें उनकी भूमि से बेदखल कर रहा है, इसके लिए उन्होने कई युद्ध भी लड़े ताकि अपने राज्य का विस्तार कर सकें।

ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की भाजपा सरकार यहूदियों के धोखे में आ गई है, दोनों के लिए मुसलमान एक समस्या है, दोनों का टकराव मुसलमानों से ही हो रहा है, शायद यही बात दोनों को एक दूसरे के निकट लाई है, ताकि दोनों मिलकर मुसलमानों पर जीवन तंग कर दें। लेकिन मुझे लगता है कि भारत सरकार यह भूल गई है कि हिंदुओं की धार्मिक पहचान स्वास्तिक जो आर्यन का प्रतीक है, जिसे भारत में पूजा के समय अक्सर इस्तेमाल किया जाता है, इसी तरह जर्मनी की नाजी पार्टी का पहचान चिह्न भी स्वास्तिक है, और यहूदियों को स्वास्तिक के निशान से सख्त घृणा है।

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स्वास्तिक से नफरत का एक उदाहरण देना चाहता हूं कि अमेरिका में नौसेना के लिए एक इमारत का 2007 में निर्माण किया गया था संयोग से उस इमारत का नक्शा स्वास्तिक के नक्शे पर बन गया जिसके कारण अंत में इस इमारत में आंशिक परिवर्तन करना पड़ा ताकि पूर्ण रूप से स्वास्तिक का निशान बाकी न रहे। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि यहूदी किसी भी मामले में इस प्रतीक को सहन नहीं कर सकते  तो उसकी पूजा करने वाले को तो कदापि नहीं।


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