इस वक़्त पूरे विश्व की निगाहे 19 मई को होने वाले ईरान राष्ट्रपति चुनाव पर है। यह चुनाव संपूर्ण विश्व के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस चुनाव के नतीजे आने के बाद ही इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि ईरान विश्व से पूर्ण रूप से जुड़ेगा या नहीं क्योंकि वर्तमान सरकार से पहले की “अहमदी नेजाद” पर अमेरिका ने जो नीतियां बनाई उन तमाम नीतियों की वजह से ईरान को बड़े आर्थिक प्रतिबंध झेलने पड़े जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा और विश्व परिवार से ईरान को काफ़ी दूर रखा गया लेकिन “हसन रुहानी” की सरकार ने सबंध बहुत अच्छे तो नही किये लेकिन थोड़ी लचक के साथ ईरान के हालात दुरुस्त करने में एक बेहतरीन भूमिका अदा करी। हसन रुहानी की सरकार आने के बाद ईरान की हालत बेहतर हुई और उस पर लगे बहुत से प्रतिबंध हटे

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अब जबकि चुनाव नज़दीक आ चुका है तो ईरान की अधिकतर जनता उदारवादी हसन रुहानी को फिर से राष्ट्रपति के रूप मे देखना चाहती है। इसके साथ बात यदि ईरान के पड़ोसी इस्लामिक मुल्को पर की जाए तो ईरान ही वो अकेला मुल्क है जिसमे डेमोक्रेसी मज़बूत है और जनता जनार्दन सत्ता पर भारी है जबकि सऊदी अरब, क़तर, अरब अमीरात जैसे देश में तानाशाही है,  ऐसे में ईरान में लोकतंत्र का मज़बूत होना मध्य एशिया के लिए बहुत ही फ़ायेदेमंद है।

फ़्रांस के चुनाव नतीजे आने के बाद चल रही राष्ट्रवाद की आंधी की रफ़्तार कम हुई है लेकिन यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस राष्ट्रवाद की आँधी की गति ईरान चुनाव के नतीजे आने के बाद और कम होती है या अपनी रफ़्तार और तेज़ कर लेती है क्योंकि बहुत से विशेषज्ञ यह बात कह रहे है कि फ़्रांस के नतीजे एक अपवाद से ज़्यादा और कुछ नहीं है। ऐसे में ईरान के चुनावे नतीजो का इंतेज़ार पूरे विश्व को है।

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ईरान चुनाव के नतीजे भारत के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण होने वाले है क्योंकि कहीं न कहीं भारतीय मीडिया और सरकार यही चाहते है कि ईरान मे दुबारा से “हसन रुहानी” की ही सरकार बने क्योंकि भारत ने हसन रुहानी की ही सरकार के साथ “चाबहार पोर्ट” का समझौता किया जिससे भारत को कई बड़े लाभ हुए है।

इन्ही सब बातों के चलते भारत ईरान मे हसन रुहानी की सरकार चाहता है क्योंकि हसन रुहानी की सरकार दुबारा आने से भारत का व्यापार बढ़ेगा और मध्य ऐशिया में भारत की स्थिती और मज़बूत होगी साथ में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भी ईरान भारत का एक बड़ा सहयोगी साबित हो सकता है। यही सब तमाम प्रमुख वजह है कि “डोनाल्ड ट्रंप” जैसे  राष्ट्रवादी की तारीफ़ो के पुल बांधने वाला भारतीय मीडिया इसके विपरीत “हसन रुहानी” को दुबारा ईरान का राष्ट्रपति देखना चाहता है।

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ईरान मामलो के विशेषज्ञ फ़िरोज़ मिथिबोर्वाला कहते है कि ईरान में लोकत्रंत काफी मज़बूत है जबकि उसके पड़ोस में सऊदी क़तर जैसे देशो में तानाशाही है लेकिन अमेरिका और लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाले देशो को कभी इन देशो में लोकतंत्र स्थापित करने की बात नहीं की?

मुंबई के पेशे से वकील मोमिन हलवासिया का कहना है कि मध्य पूर्व एशिया में ईरान लोकतंत्र का गहवारा है जिसने ये साबित कर दिया है कि मज़हब के साथ लोकतंत्र भी चल सकता है.

 


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