मनामा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने धर्म को आतंकवाद से अलग करने की पुरजोर मांग की। साथ ही, भारत और अरब लीग ने आतंकवाद से लड़ने का संकल्प लिया और इसके स्रोत, वित्तपोषण सहित चरमपंथ को खत्म करने की रणनीति विकसित करने की अपील की। अरब-भारत सहयोग मंच की प्रथम मंत्रीस्तरीय बैठक को यहां बहरीन की राजधानी मनामा में संबोधित करते हुए सुषमा ने पाकिस्तान पर परोक्ष रूप से प्रहार करते हुए चेतावनी दी कि जो लोग गुपचुप तरीके से आतंकी संगठनों को प्रायोजित करते हैं, आतंकवादी संगठन अंतत: उनको ही नुकसान पहुंचा सकते हैं।

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सुषमा ने 22 सदस्यीय अरब लीग देशों के करीब 14 विदेश मंत्रियों से कहा, ‘जिनका मानना है कि इस तरह के आतंकी समूहों के मूक प्रायोजन से उन्हें फायदा पहुंचेगा, उन्हें महसूस करना चाहिए कि उनका अपना खुद का अजेंडा है और प्रायोजक ने उनका जिस तरह इस्तेमाल किया है, वे उससे कहीं ज्यादा प्रभावशाली तरीके से संरक्षकों का इस्तेमाल करने में माहिर हैं।’

इस मौके पर अरब लीग के महासचिव नाबिल अल अराबी भी मौजूद थे। उन्होंने बैठक को भारत-अरब संबंधों में एक ‘निर्णायक मोड़’ बताते हुऐ कहा कि हम भी इतिहास के एक बड़े निर्णायक मोड़ पर हैं जब आतंकवादी ताकतें और हिंसक चरमपंथ समाज को अस्थिर करना चाहता है और हमारे शहरों, लोगों और हमारे सामाजिक ताने बाने को नुकसान पहुंचाने पर आमादा हैं।

सुषमा ने कहा, ‘साथ ही, हमें धर्म को आतंकवाद से अलग करना होगा। उन्होंने कहा कि दोनों में अंतर केवल मानवता में विश्वास रखने वालों और विश्वास ना रखने वालों का है। शनिवार को दो दिन के दौरे पर यहां पहुंचीं सुषमा ने कहा, ‘आतंकी धर्म का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन सभी आस्था के लोगों को नुकसान पहुंचाते हैं।’ दोनों पक्षों ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की और किसी धर्म, संस्कृति या जातीय समूह से उसके जुड़े होने को खारिज कर दिया।

उन्होंने आतंकवाद और इसके कारणों से निपटने और वित्तपोषण सहित आतंकवाद और चरमपंथ को खत्म करने की रणनीति विकसित करने के अलावा सीमा पार संगठित अपराध का मुकाबला करने के लिये क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की जरूरत पर जोर दिया। मनामा घोषणापत्र में देशों ने फिलीस्तीन मुद्दे का एक व्यापक और स्थायी हल किए जाने के जरूरत पर जोर देते हुए द्विराष्ट्र सिद्धांत को लागू करने की अपील की जिसमें जेरुसलम राजधानी के साथ स्वतंत्र और संप्रभु फिीस्तीनी राष्ट्र स्थापित हो और वह इजरायल के साथ शांति से रह सकें।

विदेश मंत्री ने ‘विविधता में एकता के भारत के मॉडल’ को मतारोपण और कट्टरपंथ से निपटने के लिए दुनिया के लिए उदाहरण बताया। विदेश मंत्री का किसी विश्व मंच पर भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का हवाला देना महत्व रखता है क्योंकि भारत में कथित रूप से बढ़ती असहिष्णुता के विषय पर यह हाल में शुरू हुई बहस की पृष्ठभूमि में आया है।

सुषमा ने कहा, ‘भारत में हर आस्था के लोग रहते हैं। हमारा संविधान आस्था की समानता के मौलिक सिद्धांतों और ना केवल कानून के समक्ष बल्कि रोजाना व्यवहार में भी सभी आस्थाओं की समानता के लिए प्रतिबद्ध है।’ सुषमा ने कहा, ‘हमारे देश के हर कोने में अजान की आवाज से सुबह होती है जिसके बाद हुनमान मंदिर की घंटियों की आवाज गूंजती है, फिर गुरुद्वारे से ग्रंथियों के गुरु ग्र्रंथ साहिब के पाठ की आवाज आती है और फिर हर रविवार को चर्च की घंटी के गूंजने की आवाज आती है।’

उन्होंने कहा, ‘यह दर्शन 1950 में स्वीकार किए गए हमारे संविधान का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि यह वसुधैव कुटुम्बकम के हमारे प्राचीन विश्वास का सार है।’ विदेश मंत्री ने अपने भाषण में कुरान का हवाला देते हुए कहा कि सांप्रदायिक सद्भाव पवित्र कुरान का भी संदेश है। उन्होंने कहा, ‘मैं केवल दो आयतें उद्धृत करुंगी- ला इकरा फी अल दीन (धर्म में कोई मजबूरी मत रहने दो) और ला कुम दीन ओ कुम वा इल या दीन, आपकी आस्था आपके लिए है और मेरी आस्था मेरे लिए हैं।’

सुषमा ने जोर दिया कि मतारोपण और कट्टरपंथ के खतरों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, ‘हमने बार-बार देखा है कि आतंकवाद राष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान नहीं करता। यह सभ्यताओं में टकराव के अपने हानिकारक सिद्धांत के जरिए समाजों को तबाह करना चाहता है।’ विदेश मंत्री ने कहा, ‘इस हिंसक दर्शन का एकमात्र प्रतिकार शांति, सहिष्णुता एवं सौहार्द का रास्ता है, वह रास्ता जिसकी सदियों पहले बुद्ध और महावीर ने व्याख्या की थी और आधुनिक समय में जिसे हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी लेकर आए जब उन्होंने कहा था ‘एक आंख के बदले दूसरी आंख आखिर में पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।’ साभार: नवभारत टाइम्स


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