दुनिया के बदलते भू-राजनीतिक समीकरण में एक तरफ तो अमेरिका किसी भी तरह से भारत को अपने खेमे में रखने की कोशिश करता है वहीं वह पाकिस्तान को लेकर भी अपनी रणनीति में कोई बदलाव नहीं करना चाहता। जानकार कहते हैं कि न तो अमेरिका भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सुधरने देना चाहता है और न ही वह दिल से यह चाहता है कि पाकिस्तान आतंकी गतिविधियों पर नकेल कसे। विशेषज्ञ कहते हैं कि अमेरिका बस यही चाहता है कि दोनों देशों के बीच जारी गतिरोध के बीच इस इलाके में उसका वर्चस्व कायम रहे। साथ ही उसके सैन्य उपकरणों का एक बाजार भी फलता-फूलता रहा। यही वजह है कि वह दोनों पक्षों को अपने हित साधने के लिए सालों से इस्तेमाल करता आ रहा है। अमेरिका भले ही पाक को आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगार बताकर फटकार लगाता रहा हो लेकिन उसे सैन्य मदद देना लगातार जारी है।

“अमेरिका की नीति हमेशा दोहरी रही है। एक तरफ वो भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने की कोशिश करते हैं तो दूसरी तरफ पाकिस्तान से भी। इसी दोहरी नीति का परिणाम है कि अमेरिका इस क्षेत्र के हर देश से अलग-अलग डील करता रहा है। अमेरिका की इस नीति की वजह से इस क्षेत्र में तनाव बना रहता है।

ताजा मामले में अमेरिका ने आतंकवाद से जंग के नाम पर पाक  86 करोड़ डॉलर की मदद का प्रस्ताव दिया है। विश्व बिरादरी के सामने इस मदद को जरूरी बताते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा है कि यह राशि पाकिस्तान को आतंकियों से लड़ने,परमाणु हथियारों को सुरक्षित करने और भारत के साथ संबंध सुधारने में मदद करेगी। ऐसे में सवाल यह कि क्या अमेरिका का यह तर्क किसी के गले उतरने वाला लगता है। हिंदुस्तान के जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ कमर आगा कहते हैं,

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“अमेरिका की नीति हमेशा दोहरी रही है। एक तरफ वो भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने की कोशिश करते हैं तो दूसरी तरफ पाकिस्तान से भी। इसी दोहरी नीति का परिणाम है कि अमेरिका इस क्षेत्र के हर देश से अलग-अलग डील करता रहा है। अमेरिका की इस नीति की वजह से इस क्षेत्र में तनाव बना रहता है। पाकिस्तान को दी जा रही सैन्य मदद कम से कम उनको बंद करनी चाहिए क्योंकि पाकिस्तान आतंकवाद फैलाने का काम न  सिर्फ भारत में बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों में भी कर रहा है। एक तरफ तो अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद की धुरी बताता है दूसरी तरफ पाकिस्तान को सैन्य मदद देता रहता है। खास बात यह भी कि अमेरिका के दोनों सदनों में भी इसका विरोध हो रहा है।“

पाकिस्तान को वित्तीय मदद का अमेरिकी प्रस्ताव कोई नई बात नहीं है। अमेरिका लगातार पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने के नाम पर इस तरह की मदद देता रहा है।

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कई बार पाकिस्तान ने इस मदद का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद को उकसाने में किया है। जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई एस आई को ट्रेनिंग अमेरिका ने दी है। ऐसे में अमेरिका न तो यह चाहता है कि उसका पाकिस्तान में वर्चस्व कम हो और न ही यह कि उसके संसाधनों में कोई कमी आए। यही वजह है कि कोई बहाना बनाकर वह उसे उतनी मजबूती दे देता है जिससे वह अमेरिकी मोहरा बनकर अपना काम करता रहे। बात सिर्फ इतनी भर नहीं।

“अगर हम संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान को आंतकी देश  घोषित कराने की बात करें तो उसके दोस्त इसके विरुद्ध खड़े हो जाएंगे। अमेरिका भी शायद ऐसा नहीं चाहेगा। यह लड़ाई हमारी है और हमें इससे खुद लड़ना होगा।”

आतंक के तार कई बार पाकिस्तान की सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आई एस आई से जुड़े  मिले, लेकिन अमेरिकी समर्थन की वजह से कोई उसका अहित नहीं कर पाया- न तो विश्व-बिरादरी और न ही पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार। रक्षा विशेषज्ञ और भारतीय थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फेलो पी.के. मिश्रा कहते हैं,

“हेडली के हालिया बयान से पाकिस्तान एक बार फिर से बेनकाब हो गया है। लेकिन इसके बावजूद अमेरिका का दोहरा-चरित्र जारी है। जो अमेरिका वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई से ओसामा बिन लादेन का सौदा कर सकता है उसका हाफिज सईद और लखवी पर या भारत में दहशत फैलाने वाले आतंकियों पर कार्रवाई का दबाव बनाने का कोई इरादा नहीं। वह तो अभी भी पाकिस्तान को हर तरह की मदद देने में जुटा है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर जो सैन्य सहायता या जो आर्थिक मदद पाकिस्तान को देने की बात हो रही है, उसके बारे में सब जानते हैं कि इसका इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ ही करेगा।“

पठानकोट हमले के बाद भारत का रुख सख्त है। वह चाहता है कि पाकिस्तान पर अमेरिका दिखावा करने के बजाय अतिरिक्त दबाव बनाए। भारत का मानना है कि खास तौर पर मुंबई और पठानकोट हमले के दोषियों पर कार्रवाई के लिए अमेरिका को अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए न कि उसे सैन्य या आर्थिक मदद देकर मजबूत बनाने की कोशिश करनी चाहिए। बीजेपी के नेता और पूर्व केंद्रीय गृहसचिव आर.के. सिंह हाल के दिनों में तमाम घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं,

“अगर हम संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान को आंतकी देश  घोषित कराने की बात करें तो उसके दोस्त इसके विरुद्ध खड़े हो जाएंगे। अमेरिका भी शायद ऐसा नहीं चाहेगा। यह लड़ाई हमारी है और हमें इससे खुद लड़ना होगा। पाकिस्तान के रवैये में कोर्ई बदलाव नहीं है। यह बात हाल के दिनों में हुए घटनाक्रम से फिर साफ है। अब तो ऐसा लगता है कि नवाज शरीफ कुछ भी कह लें उनके हाथ में कुछ नहीं है।“


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