लंदन ट्रांस्पैरेंसी इंटरनैशनल (टीआई) के मुताबिक भारत में भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं आई है। यहां तक कि इस मामले में भारत पाकिस्तान से भी पीछे है। पाकिस्तान ने करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) स्कोर में खुद को दुरुस्त किया है। अन्य सार्क देशों का स्कोर 2014 के मुकाबले समान है या उससे कम है। टीआई ने सीपीआई 2015 की रिपोर्ट जारी की है। इसकी औपचारिक घोषणा बुधवार को हुई।

टीआई पाकिस्तान के चेयरमैन सोहैल मुजफ्फर ने अपने बयान में कहा कि सीपीआई स्कोर के मामले में पाकिस्तान के रैंक में तीन पॉइंट का सुधार हुआ है। इस इंडेक्स के जरिए पब्लिक सेक्टर के भ्रष्टाचारों का आकलन होता है। इसमें 168 देशों को शामिल किया गया था।
भारत में पहले से कम नहीं हुआ भ्रष्टाचार: रिपोर्टभारत में दिल्ली और केंद्र की सत्ता बदली तो कहा गया कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा था लेकिन पब्लिक सेक्टर में भ्रष्टाचार अब भी कम नहीं हुआ है। इंडिया की सीपीआई में 2014 के मुकाबले सुधार नहीं है। तब भी भारत की सीपीआई 38 थी और नई सरकार के आने के बाद भी 38 ही है। इस स्कोरिंग सिस्टम के तहत जिस देश को ज्यादा स्कोर पॉइंट दिया गया है वहां भ्रष्टाचार कम है।

टीआई ने बुधवार को 2015 की सीपीआई जारी की। इसमें इंडिया का रैंक 85 से 76 हो गया है लेकिन इस बार 2014 में 176 देशों के मुकाबले 168 देश ही शामिल थे। भारत से 65 स्कोर पॉइंट आगे होकर भूटान का रैंक 27वां है। जाहिर है भूटान इस मामले में अच्छी स्थिति में है। भारत के अन्य पड़ोसी देशों का परफॉर्मेंस बुरा रहा लेकिन पाकिस्तान ने अपनी स्थिति सुधारी है। चीन का रैंक 83वां है जबकि बांग्लादेश का 139वां। इनके रैंक में कोई सुधार नहीं हुआ है। सीपीआई रिपोर्ट के मुताबिक भारत और श्रीलंका के नेता अपने वादों को पूरा करने में नाकाम साबित हुए हैं। बांग्लादेश और कंबोडिया की हालत तो और खराब है।

एशिया प्रशांत में ट्रास्पैरेंसी इंटरनैशनल के डायरेक्टर स्रिराक पल्पित ने टीओआई की ई-मेल के जवाब में कहा कि इंडिया ने पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार विरोधी कई बड़े वादे किए गए थे। ऐसा आम चुनाव 2014 और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी खूब हुआ था लेकिन सीपीआई इंडेक्स में कोई सुधार नहीं हुआ।’ दुनिया में डेनमार्क ऐसा देश है जहां भ्रष्टाचार सबसे कम है। इसके बाद फीनलैंड, स्वीडन हैं। रैंक देने के मुख्य आधार हैं- प्रेस की उच्चस्तरीय स्वतंत्रता, पब्लिक के पास उन सूचनाओं की पहुंच कि बजट का कितना पैसा कहां खर्च हुआ, सत्ता में लोगों की हिस्सेदारी और न्यायपालिका की निष्पक्षता जो गरीबों और अमीरों में भेद नहीं करती। साभार: नवभारत टाइम्स


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