मुस्लिम समुदाय में कुछ लोगों का मानना है कि कब्र पर पानी छिड़कने से मृतक की आत्मा को शांति मिल जाती है। दफ्नाने के लिए क्रबिस्तान आने वाले पुरुष रिश्तेदार मृतक की मिट्टी को नम करने के लिए पानी की बड़ी-बड़ी कैन इस्तेमाल करते हैं।

लेकिन अब अंधेरी मुस्लिम कब्रिस्तान ट्रस्ट के सदस्यों ने शहर में पानी की किल्लत को देखते हुए अपने लोगों को बड़े-बड़े बैनर लगाकर सलाह दी है कि वह इस प्रथा को नजरअंदाज करें जिसका इस्लाम में कोई आधार नहीं है। 1500-1600 कब्रों वाला यह कब्रिस्तान 60 साल से भी ज्यादा पुराना है। यहां कैफी आजमी और फारुक शेख जैसी हस्तियों की कब्रे हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीरकुछ कब्रों को झाड़ियों से ढका गया है ताकि इनकी देखभाल करने वाले रोज इनमें पानी डाल सकें। यहां के प्रवेश और वुजूखाना पर कपड़े के बैनर लगा दिए गए हैं। प्रवेश के नजदीक पानी की रंगीन कैन रखी हुई हैं। लोग अक्सर वुजूखाना आकर पानी भरते हैं और उसे कब्र पर डालने के लिए ले जाते हैं। बैनर लगने के बाद काफी लोग पानी की कमी को लेकर सचेत हो गए हैं। कमिटी के सदस्य आतिक कश्मीरी का कहना है, ‘हमने नगर निगम के अधिकारियों के किसी अनुरोध के बिना ही लोगों को चेतावनी दी है। राज्य पहली बार पानी की इतनी कमी की मार झेल रहा है। मैं मनीष नगर में रहता हूं जहां पानी की सप्लाई 35 सालों में पहली बार बंद हुई है। महाराष्ट्र के कई हिस्सों में लोगों और पशुओं के लिए पीने का पानी नहीं बचा है। ऐसे हालात में हमें पानी का नियंत्रण करना होगा।’

कश्मीरी ने कहा, ‘मृतक को शांति अल्लाह से दुआ करने पर मिलती है, न कि रिवाज पूरे करने पर। कुरान में कब्र पर पानी डालने, मोमबत्ती या अगरबत्ती जलाने जैसे कामों की इजाजत नहीं है। 18-24 महीनों में नई कब्रों के लिए जमीन का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में उन लोगों की कब्र पर पानी डालने का क्या मतलब है जिन्हें 10-20 साल पहले दफ्नाया गया था?’

मस्जिदों से नियमित रूप से वुजू में कम पानी इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। यह मस्जिद चार बंगलों से भी जुड़ी है। कमिटी के प्रवक्ता ने कहा, ‘हमें खुशी होगी अगर लोग घर में ही वुजू करें। लेकिन अगर वे यही करते हैं, तो हमारा सुझाव है कि वे तीन की जगह एक बोतल का इस्तेमाल करें।’ इस्लामिक ग्रंथों में मुस्लिमों के लिए लिखा है कि मरणोपरांत पानी के हरेक बूंद को बर्बाद करने के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

आतिक का सुझाव है कि नमाजियों को रुक-रुक कर वुजू करना चाहिए। लेकिन लोगों का कहना है कि यह व्यावहारिक नहीं है क्योंकि इसे लगातार करना होता है जिसमें एक से दो मिनट का समय लगता है। ओशिवारा के नजदीक मर्कजुल मारिफ मस्जिद ने भी पानी के संरक्षण के लिए बैनर लगा दिए हैं। मस्जिद के प्रवक्ता मौलाना बुरहानुद्दीन कासमी कहते हैं, ‘कुरान में कब्रों पर पानी डालने का जिक्र नहीं है। यह एक नया विचार है जिससे बचना सबसे अच्छा है। इस्लाम में किसी भी तरह के इसराफ (फिजूलखर्ची) की मनाही है। इसे पानी की तरह कुदरती होना चाहिए। कोई कब्र पर पौधा लगा सकता है, लेकिन बढ़ने पर पानी डालना बंद करें।’ (NBT)


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