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Tuesday, February 21, 2017
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पाठको के लेख

मुस्लिम समाज में शिक्षा की चुनौती जैसे भारी-भरकम विषय को पेश करने का दावा, "लड़ना नहीं, पढ़ना जरूरी है” का नारा और जर्नलिस्ट से फिल्ममेकर बना एक युवा फिल्मकार, यह सब मिल कर किसी भी फिल्म के लिए एक जागरूक दर्शक की उत्सुकता जगाने के लिए काफी हैं. निर्देशक ज़ैगम इमाम के...
एक अजीब लफ्ज़ मिला है मीडिया को और समाज को डर खौफ का नाम है सिमी अक्सर लोगों को मालुम ही नहीं के आखिर क्या है ”सिमी” स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया को ही सिमी कहा जाता है पुलिस का ये कहना है के सिमी आतंकवादी गतिविधियां में शामिल...
किसी नाम को बिगाड़ने की प्रथा उतनी ही पुरानी है जितनी कि नाम रखने की परंपरा। इधर नाम रखा नहीं कि उसमें तब्दीली शुरू हो जाती है। सबसे पहले नाम की काट-छांट घर से शुरू होती है। फिर वही नाम मौहल्ले में मशहूर हो जाता है। हमें अक्ल आने तक बहुत...
"जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है" -ये अल्फाज़ मुग़ल बादशाह औरंगजेब के ऊपर सबसे ज्यादा फिट बैठते हैं. जिस शख्स की कभी 'तहज्जुद' की नमाज़ क़ज़ा नहीं होती थी. जिसके शासनकाल में हिन्दू मनसबदारों की संख्या सभी मुग़ल बादशाहों की तुलना में सबसे ज्यादा थी. जिसने कट्टर...
प्रकृति की गोद में बसा भूटान एक ऐसा देश है जो खुशहाली पर जोर देता है. जहाँ पूरी दुनिया का जोर जीडीपी यानी “सकल घरेलू उत्पाद” पर होता है वहीँ भूटान अपने नागिरकों का जीवन स्तर जीएनएच यानी “सकल राष्ट्रीय ख़ुशी” से नापता है. यह एक बड़ा फर्क है जो...
ये एक सच है. कि महिलाएं देश की आधी आबादी की नुमाइंदगी करती हैं. और दूसरा बदनुमा सच ये है कि इस देश की सत्ता में उनकी नुमाइंदगी आधी भी नहीं है. नारी शक्ति का स्वरूप है. लेकिन दुनिया की सारी ताक़ते, सत्ता की सारी सहूलतें इस नारी के...
चुनावी चौसर पर लोकतंत्र की मर्यादा एक बार फिर दांव पर है. क्योंकि हार-जीत के दंभ और दमघोंटू राजनीति के बीच राजनीति की नैतिकता और सियासत की शुचिता दोनों पिस रहे हैं. यूपी में 17वीं विधानसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं. और साथ ही चार अन्य राज्यों में...
2014 में नरेंद्र मोदी बदलाव के नारे के साथ सत्ता में आये थे और जनता को भी उनसे बड़ी उम्मीदें थीं. लेकिन तीन साल पूरे होने को आये हैं और मोदी सरकार कोई नयी लकीर खीचने में नाकाम रही है, मोटे तौर पर वह वह पिछली सरकार के नीतियों...
मुझे बारातों में जाने का शौक नहीं है। न ही दावतें कोई खास पसंद हैं। मुझे याद नहीं आता कि पिछली बार किसकी बारात में गया था लेकिन बारात का एक किस्सा मुझे आज तक याद है। अगर मुझसे सुनेंगे तो आप भी इसे भूल नहीं पाएंगे। यह बात...
कोहराम न्यूज़ के लिए जावेद अनीस का लेख  हिंदी सिनेमा देश के मुस्लिम समाज को परदे पर पेश करने के मामले में कंजूस रहा है और ऐसे मौके बहुत दुर्लभ ही रहे हैं जब किसी मुसलमान को मुख्य किरदार या हीरो के तौर पर प्रस्तुत किया गया हो. “गर्म हवा”,“पाकीज़ा”,“चौदहवीं...

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