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कोलकाता | देश में संपर्दायिक सोहार्द को बढ़ाने वाले उदहारण मिलते ही रहते है. जहाँ कुछ लोग देश के माहौल में साम्प्रदायिकता का जहर घोलने का प्रयास करते है वही उन्ही लोगो को जवाब देने के लिए कुछ यासीन पठान जैसे लोग भी सामने आते है. यासीन पठान ने अपनी जिन्दगी के आधे साल केवल हिन्दुओ के धर्म स्थल के संरक्षण में बिता दिए.

बंगाल के रहने वाले यासीन पठान एक रिटायर्ड स्कूल चपरासी है. साल 1973 से वो हिन्दू मंदिरों के जीर्णोधार और संरक्षण में लगे हुए है. इसके लिए उन्हें 1993 में कबीर पुरुस्कार भी मिल चुका है. लेकिन देश में बढती असहनशीलता को देखते हुए यासीन ने इस पुरस्कार को लौटा दिया था. यासीन पठान के अन्दर बचपन से ही हिन्दू मंदिरों को लेकर एक जिज्ञासा थी.

यासीन पठान बताते है की वो बचपन से मिदनापुर के पाथरा गाँव में स्थित 300 साल पुराने मंदिरों में जाया करते थे. तभी से उनका जुडाव इन मंदिरों की और हो गया. जब वो यहाँ आते थे तो देखते थे की जो लोग मंदिर में आते है वो यहाँ से ईंट पत्थर ले जाते थे. जिसकी वजह से ये मंदिर जर्जर हालत में पहुँच गए. यही से उनको इन मंदिरों के रखरखाव की प्रेरणा मिली.

यासीन पठान ने आगे बताया की पहले इस काम में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. लोग कहते थे की तुम तो दुसरे धर्म के हो, तुम हमें कैसे रोक सकते हो. इसके बाद यासीन ने इन मंदिरों को बचाने के लिए पाथरा अर्कियोलोजी समिति का गठन किया. इस समिति के अंतर्गत लोगो को जागरुक किया गया. 2004 में इन मंदिरों के रखरखाव का जिम्मा पुरातत्व विभाग ने ले लिया. अब तक यासीन 28 मंदिरों का जीर्णोधार कर चूके है.


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