मोहम्‍मद रफ़ी के बारे में बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि रफ़ी अपने जीवन में शुरुआती दिनों में अपने पिता का हेयर सैलून संभालते थे। 1935 में उनके वालिद लाहौर आ गए थे जहां उन्‍होंने हेयर सैलून खोला था। रफ़ी जिनका उन दिनों पुकारता नाम फीको हुआ करता था, सैलून पर 11 साल की उम्र से ही काम करने लगे थे। वहां शेविंग बनवाने आए लाहौर रेडियो स्‍टेशन के डायरेक्‍टर ने एक नाई का सधा हुआ गुनगुनाना सुना तो हर्षमिश्रित आश्‍चर्य से उन्‍हें मौका देने की पेशकश कर डाली।

कुछ दिनों बाद ही एक कार्यक्रम में कुंदनलाल सहगल ने बिजली गुल होने से माइक बंद होने पर गाने से इंकार कर दिया तो श्रोताओं को संभालने के लिए बालक फीको को खड़ा कर दिया गया। बालक ने बिना माइक के कुछ यूं तान भरी कि महफिल मंत्रमुग्‍ध होकर सुनती रही और फिर कायनात ने इस बच्‍चे के लिए अपनी संभावनाओं के तमाम द्वार खोल दिये। असल में रफ़ी ने स्‍वयं ना अपना विस्‍थापन चुना,ना करियर, न गायन और ना ही अपना भविष्‍य।

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अलबत्‍ता, नियति ने स्‍वयं उन्‍हें चुना और हालातों को उनके अनुकूल मोड़ा। मानो कि उन्‍हें दुनिया के सामने लाना खुद खुदा की मर्जी रही हो। एक देहाती फीको से हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक महान पार्श्‍वगायक बनने का सफ़र उनके लिए ज़रूर हैरत वाला रहा होगा लेकिन बचपन में उनके गांव कोटला सुल्‍तानाबाद में जिस दूरदर्शी फ़कीर ने उन्‍हें देखकर बहुत बड़ा आदमी बनने का आशीर्वाद दिया था, उसके लिए अचंभे जैसा कुछ नहीं होगा। उसकी रूह कहीं होगी तो ज़रूर मुतमईन होगी।

और आज…

31 जुलाई को रफ़ी साहब की 35 वीं पुण्यतिथि है। 1980 में इस तारीख की रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा और तकरीबन साढ़े दस बजे वे चल बसे। यह साल विश्व से तीन महान लोगों के अवसान का साक्षी बना। इसी साल साहिर भी गुजर गए थे और जॉन लेनन का कत्ल हुआ था। आज रफ़ी साहब को गुजरे साढ़े तीन दशक हो गए हैं और उनसे जुड़े लोगों के दिल में वे बीते 34 साल से स्थायी टीस बनकर चुभ रहे थे, अब उसमें एक साल की और बढ़ोतरी हो गई। हर साल की तरह। कोई 20 बरस पहले टीवी पर मैंने लक्ष्मीकांत का इंटरव्यू देखा था, जिसमें रफ़ी साहब के जीवन के अंतिम दिन यानी 31 जुलाई का जिक्र करते हुए वे फूट—फूटकर रो पड़े थे। उन दिनों धर्मेंद्र—हेमा की फिल्म आसपास के गीतों की रिकार्डिंग चल रही थी। इसमें एक चार लाइन का गीत है—

“तेरे आने की आस है दोस्त,

शाम फिर क्यों उदास है दोस्त,

महकी महकी फिजां ये कहती है,

तू कहीं आसपास है दोस्त”

लक्ष्मीकांत ने बयां किया कि 31 जुलाई से कुछ समय पहले ही इसकी रिकार्डिंग हुई। एक अजीब बात उन्होंने बताई रफी साहब के बारे में, उन्होंने कहा कि वे पच्चीस साल से रफी साहब के साथ काम कर रहे थे लेकिन रफी ने कभी जाते समय यह नहीं बोला कि जा रहा हूं। उस शाम उनका व्यवहार कुछ अजीब सा था। वे जाते समय बोलकर गए कि लक्ष्मी भाई, अब मैं जा रहा हूं।

लक्ष्मीकांत को आश्चर्य हुआ, क्योंकि वे कभी आने जाने का जिक्र नहीं करते थे। वे दरवाजे तक गए, वहां से फिर लौटे। लक्ष्मीकांत के कंधे पर हाथ रखकर दोहराया— लक्ष्मी भाई अब मैं चलता हूं, बस बहुत हो गया, अब चलता हूं। लक्ष्मीकांत कुछ समझ नहीं पाए। इस वाकये के कुछ समय बाद ही रफी को दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसे। लक्ष्मीकांत इस घटना को याद करके ज़ार—ज़ार रोये थे कि रफी साहब को अपनी मौत का आभास हो गया था, और हम उनका संकेत समझ नहीं पाए।

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यह तो लक्ष्मीकांत का अनुभव है, लेकिन रफी ने जो जीवन जिया उसका अध्ययन करके अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे किस तबीयत और किस फलसफे के आदमी थे। मोहम्मद रफी एक रहस्य थे, हो सकता है बहुतों को इस खयाल से इत्तेफाक ना हो लेकिन वाकई रफी का होना एक रहस्य का होना था और उनका जाना एक रहस्य का धरती से बिना खुले चले जाना हुआ। वो आदमी पकड़ में नहीं आया कि आखिर था क्या चीज। भगवान जाने वो क्या चीज थी जो एक औसत दिखने वाले शख्स के हलक से अलौकिक आवाज निकलवाकर चली गई। रफी खुद को ताउम्र कभी सेलिब्रिटी नहीं मान पाए।

उनका रवैया कभी कुटिल, कभी दुनियादार, कभी लालची नहीं रहा जैसा कि उनके समकालीनों का जगजाहिर रहा है। क्या वाकई उस आवाज का कोई रहस्य है। केवल आवाज को देखिये, व्यक्ति को नहीं। क्योंकि व्यक्ति का आचरण तो एकदम सामान्य है, औसत है, एक गायक के जैसा बिल्कुल नहीं और एक लीजेंड के जैसा तो कतई नहीं। यानी वो क्या तत्व था जो इस व्यक्ति को माइक के सामने अचानक दिव्य बना देता था। गायन से इतर बाकी समय साधारण तरीके से चलने, बोलने वाला एक अधगंजा सा आदमी जब माइक के सामने खड़ा हो जाता था तो कल्पना कीजिये उस क्षण क्या घटता होगा!

आखिर उनमें ऐसा क्या आ जाता था कि आवाज मदहोश कर देने वाली हो जाती और गाना खत्म होते ही वे वापस औसत पुरुष हो जाते। उनके गिने-चुने उपलब्‍ध साक्षात्‍कारों को गौर से देखने पर हम पाते हैं कि वे बेहद संकोची,शर्मीले इंसान तो थे ही, साथ ही ऐसे शख्‍स थे जिसे कैमरा फेस करने से लेकर साक्षात्‍कार की “संवाद परपंरा” का कोई भान नहीं था। व्‍यक्तित्‍व विकास जैसे शब्‍द उनके लिए एकदम बेमानी थे, वर्ना तमाम हस्तियां अपने हर पल को लेकर बहुत जागरूक रहती हैं। सारे कलाकार अपने हर पल का ध्‍यान रखते हैं,उठने-बैठने, चलने-फिरने का और साक्षात्‍कार में नपा-तुला बोलने में सब माहिर रहते आए हैं। इसके विपरीत रफ़ी खुद को “नाकुछ” समझने की ग्रंथि से बाहर ही नहीं निकल पाए। इसे उनका बड़प्‍पन कहें तो ठीक अन्‍यथा रहनुमाई तो यह बेशक है ही।

उनके समकालीन कई लोगों ने समय—समय पर कहा भी है कि वे अत्यंत सज्जन थे। ना कभी गुस्सा करते ना अपशब्द बोलते। दुनियादारी से दूर रहते। अपना काम करके अलग हट जाते। यह आचरण भी गौरतलब है। असल में, वे गाने के अलावा कुछ जानते भी नहीं थे या यूं कहें कि गाने के लिए ही “अभिशप्त” थे, प्रतिबद्ध थे। गाने के लिए ही आए थे और गाने के सिवा कुछ करके भी नहीं गए। किसी दूसरी विधा में हाथ आजमाना तो दूर, विचार तक नहीं किया। लता ने रायल्टी की बात कही तो उससे किनारा कर लिया। वे अपनी आवाज को उपर वाले का आशीर्वाद मानते थे और इस धारणा को निभाया भी। वे अपनी आवाज़ के व्‍यवसायीकरण करने के पक्ष में नहीं थे। ऐसे कई किस्से हैं जब उन्होंने किसी संगीतकार से पैसा नहीं लिया या कई गीत निशुल्क गा दिए। गोया, वे बारह महीनों रमजान की मानसिकता में रहते थे। जो व्यक्ति एक साक्षात्कार में खुद को व्यक्तित्व शून्य साबित कर देता है वह परदे पर दर्जनों किरदारों का कंठहार कैसे बन जाता है,ये बात वाकई रहस्य से कम नहीं। बहुत कम संभावना है कि वे निजी जीवन में एक्सीलेंस जैसे किसी तत्व को शायद जीए हों। अमिताभ बच्‍चन एक साक्षात्‍कार में उनके साथ जुड़ा एक वाकया याद करते हैं कि एक बार किसी टूर पर लौटते समय मुश्किल खड़ी हो गई थी जब तयशुदा गायक कलाकार गैर मौजूद था और आयोजकों समेत सभी कलाकारों की प्रतिष्‍ठा का सवाल था। ऐसे में अमिताभ ने रफ़ी साहब से, जो कि ऑलरेडी वापसी के लिए विमान में बैठ चुके थे, इल्तिज़ा की कि वे कार्यक्रम में एक दिन और रुक जाएं और कुछ गीत गा दें। बकौल अमिताभ, स्‍वयं उन्‍हें विश्‍वास नहीं हुआ कि रफ़ी साहब तत्‍काल राजी हो गए और प्‍लेन से झट उतर गए। अमिताभ ने माना कि उनके जैसा सहज, अहंकारहीन कलाकार आज तक नहीं देखा क्‍योंकि कलाकारों का अहंकारी और तुनकमिजाज होना आम बात है। इसके विपरीत रफ़ी बिलकुल विपरीत थे। किसी भी प्रकार के सेलिब्रिटी टेंट्रम या नाज-नखरों से उनका कभी संबंध नहीं बन पाया।

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इसलिए हैं रफ़ी संपूर्ण

किसी भी कलाकार के आकलन के दो पैमाने हैं। व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व। बदकिस्‍मती से हमारे तमाम प्रतिष्ठित कलाकार कृतित्‍व के मामले में तो आगे निकल जाते हैं लेकिन इंसान के तौर पर निराश कर देते हैं। सिनेमा और गैर-सिनेमा के ऐसे कई कलाकार हैं जो अपनी कला तक तो ठीक हैं लेकिन एक व्‍यक्ति के तौर पर बुरे साबित हुए। रफ़ी बेशक इनमें अपवाद हैं और अपनी कोटि आप हैं। एक कलाकार के तौर पर तो वे बेमिसाल हैं ही, एक इंसान के तौर पर भी उनकी मिसाल खोजना मुश्किल है। उनके जैसे लोग लाखों में एक होते हैं,इसीलिए बॉलीवुड के अधिकांश लोग उनका जि़क्र आने पर उन्‍हें बेखाख्‍ता फरिश्‍ते की संज्ञा दे ही देते हैं। यदि हम उनके केवल कला पक्ष को ही देखें तो पाएंगे कि आवाज़ से अदाकारी का सिलसिला उन्‍होंने ही शुरू किया जो बाद में अन्‍य गायकों के लिए भी प्रेरणा बना। जिस तरह वे शम्‍मी कपूर और देव आनंद के लिए परिपूरक ही बन गए थे, बाद में इसी से प्रेरणा लेकर किशोर कुमार ने स्‍वयं को तैयार किया और वे राजेश खन्‍ना व अमिताभ के लिए “कंठ” बने। और बाद की पीढ़ी में उदित नारायण ने इसी विधा को साधा और आमिर खान के लिए फिट आवाज साबित हुए। मोहम्‍मद रफ़ी संपूर्ण पार्श्‍वगायक इसलिए भी हैं क्‍योंकि अपनी वर्सेटाइलनेस, अपनी विविधता के चलते उन्‍होंने हर रंग, हर मूड के गीत गाए। शास्‍त्रीय गायन हो या रॉक एन रोल, रोमांस हो मायूसी, फकीर का गीत हो या भजन, उन्‍हें भी कुछ भी दे दें, वे अपनी आवाज़ से उसे परफेक्‍ट बना देते थे। उनकी आवाज़ अपने आप में एकदम भरी पूरी है। यदि आवाज़ को कोई शक्‍ल दी जा सके तो कहा जा सकता है कि उनकी आवाज़ गोरी,सुडौल,सुंदर,भरी और ज़हीन है। आवाज़ के जितने भी पैरामीटर होते हैं, उन पर उनकी आवाज़ एकदम खरी उतरती है। ऐसा लगता है कि यह आवाज़ खु़दा की नेमत है जो किसी रफ़ी नामक इंसान की झोली में आ गिरी। यह व्‍यक्ति किसी भी नाम का हो सकता था, किसी भी वर्ग या किसी भी नागरिकता का, लेकिन मायना आवाज़ का है।

कायाप्रवेश और रूह से संवाद

हिंदी में एक शब्‍द होता है कायाप्रवेश। यानी किसी व्‍यक्ति या विषय से ऐसा तादात्‍मय बन जाना जो घनीभूत होकर उसी का प्रति-संस्‍करण मालूम पड़े। रफ़ी के साथ यह मामला नजर आता है। उनके साक्षात्‍कारों को गौर से देखिये। किसी भोले,देहाती बंजारे की मानिंद वे लजाते हुए केवल अधिक से अधिक इतना ही बोल पाते थे कि “पब्लिक को खुस करना है” यह सुनकर उनके तमाम चाहने वालों को ज़रूर हैरत हो सकती है क्‍योंकि जो व्‍यक्ति अपने गीतों के लाजवाब उच्‍चारण के लिए जाना जाता है और उनके तलफ्फुज पर हम वारी जाते हैं, वह आदमी अपने दैनिक जीवन में बेहद साधारण व मामूली प्रतीत होता था। बिलकुल भान नहीं होता था कि यह शख्‍स माइक के आगे खड़ा हो जाता है तो किसी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर या भाषाविद् की तरह भाषा पर अधिकार रखता है। उनके गायन और बोलने की शैली जुदा थी। वे किसी अमूर्त प्रेरणा से ही संचालित होते थे,गायन के अलावा उनका कोई वजूद था भी नहीं।

लौटते हैं 35 साल पीछे उनके जनाजे की जानिब…

उन्हें बाम्बे के ब्रांदा स्थित कब्रिस्तान में दफनाया गया था। तथ्य बताते हैं कि उस दिन बहुत जोर की बारिश हुई थी, मानो आसमान ही फट पड़ा हो। उनके जनाज़े में दस हजार से अधिक लोग शामिल हुए जो शायद कीर्तिमान बन गया था। ऐसा माना जाता है कि उस दिन तक बांबे के इतिहास में ऐसा जनाज़ा किसी का नहीं देखा गया जिसे अंतिम विदा देने पूरा शहर ही उमड़ आया हो। सरकार ने भी बकायदा उनकी मौत पर दो दिन का शोक रखा था। दीवानों की मानें तो उनके जनाज़े पर स्वयं आसमान रोया था, खुदा रोया था। जनाज़े में चेहरे कम और छाते ज्यादा नजर आते हैं। पूरे रास्ते छाते ही छाते खुल गए थे। लेकिन जिस देश ने उन्हें इतनी मोहब्बत दी, इसी देश में 2010 में उनकी कब्र खोद दी गई, इसलिए कि नई कब्रों के लिए जगह बनाई जा सकें और नई लाशों को दफनाया जा सके। फिल्म शोला और शबनम में कैफी आज़मी का लिखा और खैयाम साहब का संगीतबद्ध किया खूबसूरत गीत है—

“जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें,

राख के ढेर में शोला है ना चिंगारी है”

वाकई, रफी की राख में अब ना अब जज्बातों का शोला है, न अफसोस की चिंगारी। ठीक है, अब जमीन खोदकर हासिल भी क्या होना है? जिनके सीने में रफी दफन हैं, वहां से रूखसत होने की कोई सूरत ही मुमकिन नहीं।

खबर- नयीदुनिया 


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