कुछ देशों की सेनाएं साजो-सामान के मामले में भी अमेरिका के लगभग बराबरी पर पहुंच गई हैं। अपनी सेना को दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना मानने का दंभ पालने वाले अमेरिका के लिए यह खबर परेशान करने वाली है कि रूस एक बार से सैन्य तकनीक के मामले में उससे आगे निकलता हुआ दिख रहा है। खासतौर पर अरमाता टैंक प्रणाली सहित सुखोई के नए मॉडल पर काम करके। अरमाता टैंक प्रणाली पांच मील तक गन गोलों के अलावा गाइडेड मिसाइल दाग सकता है तो सुखोई की नई पेशकश अमेरिका के F-16 विमान से भी बहुत आगे है। थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फेलो पी.के. मिश्रा ने कहा,

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“मैं बहुत साफ तौर पर कहना चाहता हूं कि रूस ने जो टैंक बनाया है इस तरह का टैंक अमेरिका में भी उपलब्ध नहीं। 1991 में उनकी जो हालत थी जब उन्होंने इराक पर हमला किया था वह हालत अब नहीं रही। रूस अरमाता टैंक के साथ ही अमेरिका के एफ-16 विमान को टक्कर देने के लिए अत्याधुनिक सुखोई-35 बना रहा है। रूस की ये तकनीक F-16 से बहुत ज्यादा उन्नत है जो अमेरिका पाकिस्तान को देने वाला है। राष्ट्रपति पुतिन की अगुवाई में रूस अमेरिका को कड़ी टक्कर दे रहा है इसमें कोई शक नहीं। सैन्य साजो-सामान में रूस जिस गति से तरक्की कर रहा है, जो अत्याधुनिक तकनीक हासिल कर रहा है उसमें अमेरिका पीछे छूट गया है। सीरिया में भी अमेरिकी कार्रवाई को कोई असर नहीं हो रहा है। वो इतने ताकतवर और सक्षम नहीं कि सीरिया में लड़ाई करें। युद्धपोत के क्षेत्र में भी रूस और चीन दोनों अमेरिका से कहीं बहुत आगे हैं। चीन का नौसेना और रूस की नौसेना अमेरिकी नौसेना को कभी भी मात दे सकते हैं। दूसरी बात यह भी है अब तो अमेरिका को उतर कोरिया जैसा छोटा देश भी परमाणु और हाइड्रोजन बम बनाकर कड़ी टक्कर दे रहा है। इससे अमेरिका को काफी झटका लगा है।“

टैंक ’अरमाता’

अमेरिकी की कमजोर होती सैन्य व्यवस्था की तस्दीक खुद वहां की एक पत्रिका ‘द नेशनल इंटरेस्ट’ के एक लेख में की गई है। अपने लेख में अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ और थलसेना के पूर्व अधिकारी एल डेनियल डेविस ने लिखा है कि रूस ने अरमाता टैंक प्रणाली बनाकर अमेरिका की श्रेष्ठता को कड़ी चुनौती दी है। अफगानिस्तान में अमेरिकी कमान के सदस्य रहे एल डेनियल डेविस ने यह भी लिखा है कि अमेरिकी सेना अब उतनी ताकतवार नहीं जितना वो 25 साल पहले हुआ करती थी। भारतीय रक्षा विशेषज्ञ पी.के.मिश्रा स्पुतनिक से बात करते हुए कहते हैं,

“साफ तौर पर 1991 के मुकाबले अमेरिका की सैन्य क्षमता काफी नीचे गिर गई है। ऐसे में हो सकता है कि रूस घोषित रूप से इस मामले में भी अमेरिका से आगे निकल जाए। वहीं अमेरिका एशिया में अपनी धमक कायम रखने के लिए दक्षिणी चीन सागर में युद्धपोत रखकर चीन को चुनौती देना चाहता है। अमेरिका यह भी चाहता है कि एशिया में भारत–पाकिस्तान के बीच की खाई बनी रहे ताकि वह यहां मौजूद रहे और उसके सैन्य साजो-सामान का बाजार फलता-फूलता रहे।“

अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ एल डेनियल डेविस और भारतीय रक्षा विशेषज्ञ पी.के.मिश्रा दोनों इस बात से सहमत हैं कि अमेरिका और दूसरे देशों की सैन्य क्षमता के बीच फर्क लगभग सिकुड़ गया है। विशेषज्ञ बताते हैं कि एक ओर हथियार और तकनीक के मामले में रूस,चीन जैसे देश लगातार अपने कदम बढ़ाते जा रहा है वहीं पेंटागन का हथियार कार्यक्रम बिखरा पड़ा है। जानकारों का कहना है कि 2003 में पेंटागन ने भविष्य की युद्धक प्रणालियों पर काम शुरू किया जिसे 2009 में बंद कर दिया गया।

अमेरिका को इसमें अरबों डॉलर का नुकसान हुआ और कुछ भी हासिल नहीं हुआ। विशेषज्ञ कहते हैं कि अमेरिका की सैन्य क्षमता इसलिए सिकुड़ती जा रही है क्योंकि वो अहंकार से पीड़ित है। जानकार कहते हैं कि अमेरिका साल 2016 में भी 1991 वाला अहंकार पाले बैठा है जब उसने इराक पर फतह हासिल की थी। इराक में अमेरिका की ‘डेजर्ट स्टॉर्म’ नाम की सैन्य कार्रवाई कामयाब रही थी। और इसी अहंकार ने अमेरिकी सैन्य शक्ति का अहित किया है जिसकी पोल अब खुलने लगी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बहुत जल्द इसका असर अमेरिका के अंतरार्ष्ट्रीय सैन्य बाजार में पड़ता हुआ नजर आ सकता है।


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