” अगर अमेरिका मेरे एक गुनाह की बात करता है ,
तो मेरे पास अमेरिका के गुनाहों की बहुत लम्बी फेहरिश्त है “.

ये अल्फाज़ किसने कहे थे , यह तो याद नहीं मगर इतना ज़रूर है कि इतिहास का इससे बड़ा सच आज तक किसी ने नहीं कहा होगा और अमेरिका को इस तरह आइना किसी ने नहीं दिखाया होगा .आज विश्व में आतंकवाद की जो परिभाषा प्रचलित है , उसके अनुसार यदि मुसलमानों पर हमले होते हैं ,या हजारों , लाखों मुसलमानों की हत्याएं होती हैं तो वह घटना ” आतंकवाद ” नहीं कहलाती . हाँ , मुसलमान यदि किसी की भी हत्या करे तो वह एक ही पल में दुर्दांत आतंकवादी घोषित हो जाता है .इस परिभाषा के अनुसार अल कायदा , हमास , हिजबुल्लाह द्वारा किये गए सारे हमले दुर्दांत , क्रूर , अमानवीय , निर्मम और कायरता पूर्ण आतंकवादी कारवाईयां हैं मगर अमेरिका , ब्रिटेन , फ़्रांस और इजराइल द्वारा लाखों मुसलमानों की हत्याएं ” आत्मरक्षा में की गयी कार्रवाई ” ‘ या ” आतंकवाद के खिलाफ युद्ध ” या तानाशाही को समाप्त कर लोकतंत्र को स्थापित करने का ” विनम्र और शांतिपूर्ण ” प्रयास है . अमेरिका और ब्रिटेन जिस ” लोकतंत्र को इराक ले गए हैं , उसके चिथड़े रोज़ बग़दाद , बसरा और फलूजा की सड़कों पर बिखरे हुए मिलते हैं बड़े बड़े तथाकथित ” आतंक -विशेषज्ञ ” कहते हैं कि जन्नत का लालच मुसलमानों को आतंकवादी बना रहा है , मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि .लाखों जिंदगियों को नरक बनाने वालों के खिलाफ लड़कर अगर कोई जन्नत जाना चाहता है तो इसमें किस मुल्ला की गलती है , किस इस्लाम का दोष है औरइसके लिए कुरान की किस आयत की गलत व्याख्या ज़िम्मेदार है ???

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लोग कहते हैं कि आखिर सारे मुस्लिम देशों में ही आतंकवाद क्यों फ़ैल रहा है ? हकीकत यह है कि इस आतंकवाद का इस्लाम से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है .आज अगर इन मुस्लिम देशों में मुसलमानों की जगह हिन्दू बहुसंख्या में होते और यदि अमेरिका और पश्चिमी ताकतें वहां भी वैसा ही तांडव करती जैसा आज कर रही हैं तो यकीन मानिये कि वहां के ” हिन्दुओं ” में भी वैसा ही आक्रोश उत्पन्न होता जैसा वहां के मुसलमानों में पैदा हो रहा है और वे हिन्दू भी उसी तरह आतंकवाद के रास्ते पे चलते जिस रास्ते पर वहां के मुसलमान चल पड़े हैं ///

इराक , अफगानिस्तान , बोस्निय ,फिलिस्तीन और अब सीरिया में लाखों की संख्या में मुसलमान मारे जा चुके हैं . क्या इतनी बड़ी ” तादाद ” में अलकायदा , हमास या हिजबुल्लाह द्वारा काफिरों को मारे जाने के कोई आंकड़े आपके पास हैं ?शायद नहीं . इसके बाद भी इस्लाम बदनाम ….इसके बाद भी मुसलमान आतंकवादी …इसके बाद भी मुसलमानों से ही ये मुतालबा कि वे आत्मचिंतन करें और आतंकवाद की पर्याप्त निंदा करें ! ! !
कहना न होगा कि कितना दोगला , एक पक्षीय ,क्रूर , सौतेला और निष्ठुर रवैया है यह इस्लाम और मुसलमानों के प्रति.

” मुस्लिम आतंकवाद ” का शोर मचने वालों को मुसलमानों का यह ” विश्व व्यापी नरसंहार ” दिखाई देता है या नहीं ? क्या इनका एक मात्र गुनाह मुसलमान होना है ? या इनके पास कुदरत की दी हुई पेट्रोल कि दौलत इनके लिए मौत का सामान बन गई है ? कुछ भी हो , बराक ओबामा से कहना चाहूँगा कि वे मुसलमानों से यह न पूछें कि आतंकवाद का कारण क्या है . आज विश्व में जो आतंकवाद नज़र आ रहा है , उसका कारण ” कुरान ” में ढूंढने से नहीं मिलेगा .उसका कारण अमेरिका और उसके साथी पश्चिमी देशों की साम्राज्यवादी बाइबिल में ढूंढना पड़ेगा जिसने अतीत से ले कर आज तक करोड़ों बेगुनाहों को अपनी साम्राज्यवादी लिप्सा के कारण मौत के घाट उतारा है .इनमे वियतनाम , हिरोशिमा , नागासाकी ,इराक , पनामा, अगनिस्तान , लीबिया से लेकर सीरिया जैसे अनगिनत देशों के उदहारण सामने हैं ///
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ओबामा साहब , मुसलमानों से कुरान पढ़वा कर आतंकवाद का कारण मत ढूंढवाइए , बल्कि अपने मुल्क की साम्राज्यवादी बाइबिल को अच्छे से पढ़ लीजिये . आतंकवाद का कारण , जनक , सर्जक और प्रसारक कौन है , किसने अलकायदा , isis और अन्य आतंकवादी संगठनों को जन्म दे कर पाला पोसा और बड़ा किया , ये सारी बातें आपको खुद ब खुद समझ में आ जाएँगी ///
और आपको यह भी बता दूँ …इस समस्या का कारण सिर्फ राजनीतिक ही नहीं है .धार्मिक भी है .क्योकि अमेरिका का राष्ट्रपति जब अपने पद और गोपनीयता की शपथ लेता है तो ” बाइबिल ” को हाथ में रख कर लेता है … और यह धार्मिक कारण कारण आपको ” न्यू टेस्टामेंट ” के आधुनिक अमेरिकी एडिशन में स्पष्ट रूप से नज़र आ जायेगा . शर्त यह है कि इस एडिशन को आप ” बराक ओबामा ” की नज़र से न पढ़ें , बल्कि ” बराक ” और ” ओबामा” के बीच में ” हुसैन ” को रख कर पढ़ें ///

मोहम्मद आरिफ दगिया

21/11/2015


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