सदी के महान शिक्षाविद डॉ ज़ाकिर हुसैन ने कभी कहा था –

‘हमारे देश को गर्म खून नहीं चाहिए जो हमारी गर्दन से रिसे, बल्कि माथे का पसीना चाहिए जो साल के बारहों महीने बहता रहे. अच्छे काम, गंभीर काम करने की ज़रूरत है. किसान की टूटी हुई झोपड़ियों से, कारीगर की अंधेरी छत से और एक गांव के बेकार स्कूल से हमारे भविष्य या बनेंगे या तो बिगड़ेंगे. राजनीतिक झगड़ों को एक या दो दिन में सभा-सम्मेलन करके सुलझाना मुमकिन है, लेकिन वह जगहें जिन्हें हमने लक्षित किया है, वह सदियों से हमारे भाग्य का केन्द्र रही हैं. इन क्षेत्रों में काम करने के लिए धैर्य और दृढ़ता चाहिए. यह मेहनत का और बिना नतीज़ों वाला काम है. इसका नतीजा जल्दी आने वाला नहीं है. लेकिन हां, जो देर तक इस रास्ते पर काम करेगा, उसे सकारात्मक परिणाम ज़रूर मिलेंगे.’

ज़ाकिर हुसैन के इस कथन पर देश व सरकार ने चाहे अमल किया हो या न किया हो, लेकिन ज़ाकिर हुसैन के शागिर्द रहे पदमश्री डॉ. सैय्यद हसन ने इस बात की गांठ ज़रूर बांध ली थी.

भारत में ऐसे बहुत सारे ‘गुदड़ी के लाल’ हैं, जो संसार के तमाम सुख-सुविधाओं को त्याग चुपचाप एक कोने में रहकर अपना काम करते रहते हैं. इनका जितना कम नाम होता है, उनका काम उतना ही महान, उतना ही लोकोपकारी.

इन्हीं नामों में से एक नाम है –डॉ. सैय्यद हसन… यह वो नाम है, जो गरीबों, पिछड़ों और बेसहारों के लिए उम्मीद के सूरज जैसा है.
दरअसल, डॉ. हसन एक ऐसी शख़्सियत थे, जिन्होंने अपनी सारी उम्र, अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा और अपने सारे संसाधन गरीबों, पिछड़ों, मज़लूमों व खासकर मुसलमानों की तालीम की ख़ातिर खर्च कर दी.

 

डॉ. हसन का जन्म 30 सितम्बर, 1924 में बिहार के जहानाबाद में हुआ था. 10 साल की उम्र में वे दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया आ गए. जामिया से ही उर्दू मीडियम में मैट्रिक की तालीम हासिल की. फिर बारहवीं व ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी उन्होंने जामिया से ही हासिल की. जामिया में वे ज़ाकिर हुसैन के ख़ास शागिर्दों में से एक थे.

यू-ट्यूब पर मौजूद एक इंटरव्यू में डॉ. हसन बताते हैं, ‘जब वे छठी क्लास में थे तो ‘उर्दू की छठी किताब’ पढ़ी थी. जो उस समय दर्स-ए-उस्मानिया, हैदराबाद से छपी थी. किताब का पहला सबक़ ‘वसूले-इल्म और गैरों की जद्दोजहद’ था. इस सबक़ में बताया गया था कि जापान देश तरक़्क़ी पर क्यों है? उसकी एक बड़ी वजह ये है कि उनके नौजवान बड़ी तादाद में विदेश जाते हैं. विदेश जाकर वहां तालीम व अपने काम का तजुर्बा हासिल करके वापस आकर अपने देश की सेवा में लग जाते हैं.’

वो आगे बताते हैं, ‘हमने सोचा कि जब जापान का युवा यह कर सकता है तो फिर हिन्दुस्तान का नौजवान यह क्यों नहीं कर सकता? और कोई करे या न करे, मैं भी तो हिन्दुस्तानी हूं. मैं ही क्यों न करूं? यह ख़्याल मेरे मन में 1938 में ही आ गया था. उस समय मैं छठी क्लास का स्टूडेन्ट था.’

डॉ. हसन यह भी बताते हैं कि उर्दू की यह किताब रामलाल वर्मा ने लिखी थी. ऐसे में सबको समझ लेना चाहिए कि ये उर्दू हिन्दू-मुसलमानों दोनों के लिए एक है.

डॉ. हसन खेल-कूद में काफी आगे रहे. उन्होंने स्पोर्ट्स में जामिया को न सिर्फ़ रिप्रेजेन्ट किया, बल्कि बाद में वो स्पोर्ट्स के इंचार्ज भी रहे. इतना ही नहीं, इनकी सलाहियतों को देखते हुए इन्हें जामिया के प्राईमरी स्कूल का हेडमास्टर भी बना दिया गया.

वे आगे बताते हैं, ‘आज़ादी के बाद मुझे जामिया की ओर से पुर्णिया भेजा गया. मैंने यहां के गरीबी व बदहाली को क़रीब से देखा. इसलिए 1951 में ही फैसला कर लिया था कि किशनगंज में एक स्कूल खोलूंगा. लेकिन यह बात छठी क्लास से ही दिलोदिमाग़ में बैठी थी कि विदेश जाउंगा और वापस आकर अपने देश की सेवा करूंगा. तभी अचानक 1954 में लिंकन यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप का लेटर आ गया.’

डॉ. हसन के मुताबिक़ वे अमेरिका में 10 साल तक रहे. लेकिन कभी भी रेसिडेंसियल वीज़ा या सीटिजनशिप के लिए अप्लाई नहीं किया. अपने स्टूडेन्ट वीज़ा का ही नवीनीकरण करवाते रहे.

वे आगे बताते हैं, ‘अमेरिका में एसिस्टेंटशिप और फेलोशिप के सहारे पढ़ता और पढ़ाता रहा. वहां बेस्ट टीचर का अवार्ड भी मिला. लेकिन अमेरिका के कारबोनडेल स्थित यूनिवर्सिटी से पीएचईडी की डिग्री मिलते ही मैं अमेरिका से सीधे किशनगंज पहुंच गया.’

किशनगंज में काम करना डॉ. हसन के लिए इतना आसान नहीं था. लेकिन अपने उस्ताद डॉ. ज़ाकिर हुसैन की बातों से वो हमेशा प्रेरणा लेते रहे. डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने कभी अर्थशास्त्र की क्लास में पढ़ाया था –‘Start from nothing, character is your asset…’

डॉ. हसन ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना काम शुरू किया. शैक्षणिक रूप से पिछड़े इस जिले में शिक्षा की अलख जगाने का बीड़ा उठाते हुए 14 नवंबर 1966 को इंसान स्कूल की स्थापना की. हालांकि उन्हें इसके लिए कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

वे अपने इंटरव्यू में बताते हैं, ‘यहां के लोग मुझे सीआईए और पाकिस्तान का एजेन्ट समझते थे. सरकार ने भी मेरे पीछे सीआईडी लगा रखी थी. कई बार लोगों ने स्कूल में आग भी लगायी. लेकिन ऊपरवाले की मेहरबानी देखिए… सरकार ने मुझे फिर सेन्ट्रल एडवाईज़री बोर्ड का सदस्य बना दिया. 1986-96 तक मैं बोर्ड का सदस्य रहा. तब जाकर लोगों ने मुझ पर थोड़ा-बहुत ऐतबार करना शुरू किया.’

डॉ. हसन बताते हैं, ‘मैं पॉलिटिकल साईंस का स्टूडेन्ट हूं. मगर सियासत से हमेशा दूर रहा. कभी भी राजनीति में जाने की दिलचस्पी नहीं हुई. कभी किसी मंत्री को मैंने खुद से नहीं बुलाया और न ही मिलने गया…’

सैय्यद भाई के नाम से मशहूर डॉ. सैय्यद हसन एक भारतीय शिक्षाविद्, मानवतावादी और इंसान स्कूल के संस्थापक थे. 2003 में भारत की ओर से नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उन्हें नामित किया गया था. भारत सरकार ने 1991 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया. इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में सेवाओं के लिए उन्हें जवाहरलाल नेहरू एजुकेशन पुरस्कार से सम्मानित किया गया थे.

डॉ. हसन की शोहरत का आलम यह था कि वे सिर्फ़ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपने प्रगतिशील विचारों के लिए मशहूर थे. तालीम की रोशनी बांटने वाली जमातों की उन पर ख़ास नज़र थी. उन्हें अमेरिका से कप्पा डेल्टा फी की ओर से दो बार अवार्ड मिला, 1980 में नेहरू लिट्रेसी अवार्ड, 1990 में नेशनल इंट्रिगेशन अवार्ड और वर्ष 1991 में भारत सरकार के द्वारा पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किए गए. 2002 में नेशनल इंट्रिगेशन अवार्ड मीडिया ग्रुप, 2005 में उर्दू वेलफेयर सोसायटी द्वारा लाइफ टाइम सोशल वेलफेयर बोर्ड, 2007 में नेहरू युवा केंद्र द्वारा लाइफ टाइम इंस्पीरेशनल ओनर, 2008 में शिक्षा भारती पुरस्कार के अलावा बैंकॉक में इंटरनेशनल एचीवेंट अवार्ड, बिहार सरकार द्वारा बिहार गौरव अवार्ड एवं अमेरिका में भी उन्हें कई अवार्ड से नवाजा गया.

और इन सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आज उनके इस इंसान स्कूल से पढ़े हुए छात्र पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. जो न सिर्फ देश में बल्कि पूरी दुनिया में अपना नाम रोशन कर रहे हैं. वे बड़े-बड़े ओहदों पर काम कर रहे हैं. जबकि यह सब कभी डॉ. हसन के ‘झोपड़ियों का शहर’ में रहा करते थे. जिन्हें तराश कर डॉ. हसन हीरा बनाने का काम किया.

डॉ. हसन ने कभी एक इंटरव्यू में कहा था –‘पहले deserve करो, फिर desire रखो.’ हमारी नई नस्ल के लिए डॉ. हसन एक सबक़ की तरह हैं. हर पल, हर लम्हा उनसे सीखने की ज़ररूत है. खासतौर पर तालीम के मैदान में काम करने की ज़रूरत है, क्योंकि डॉ. हसन का कहना था ‘जहालत दूर होने से ही गुरबत दूर हो सकती है…’

आज डॉ. हसन हम सबके बीच में नहीं हैं, लेकिन आज के ऐसे दौर में जब शिक्षा लगातार दौलतमंदों की जागीर बनती जा रही है, डॉ. हसन की कोशिशों का एक नायाब उदाहरण हमारे सामने खुद-ब-खुद आ जाती है. उन्होंने आने वाली पीढ़ी को तालीम से जोड़ने के ख़ातिर नींव मज़बूत करने का बेहद अहम काम किया. उनके योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है.

ऐसे में राज्य से लेकर केन्द्र सरकार तक – जो शिक्षा को आख़िरी आदमी तक पहुंचाने का दावा तो करती हैं, मगर हक़ीक़त में पत्ता भी हिलता नज़र नहीं आता – को डॉ. हसन की कोशिशों से सीखने की ज़रूरत है, क्योंकि ये सवाल हम सबका नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के मुस्तक़बिल का भी है.


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