allahbad university

कोहराम न्यूज़ के लिए विष्णु प्रभाकर उपाध्याय का लेख 

हिंदुस्तान के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में आंदोलन जारी है। कोई इस आंदोलन को भाजपा विरोधी कहकर एक दायरे में महदूद कर देना चाहता है तो कोई इस आंदोलन को एक खास विचारधारा से प्रेरित बता रहा है तो कोई छात्रों को राजनीति से दूरी बनाकर रहने की नसीहत दे रहा है। ये कहा जा रहा है कि छात्रों को अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर लगाना चाहिए। बेशक छात्रों का काम पढ़ाई करना है लेकिन यहाँ ये सवाल जिसका उठना लाजिमी है वो ये कि क्या राजनीति करने की भी कोई खास उम्र होगी?  क्या राजनीति करने की भी कोई योग्यता होती है? या फिर राजनीति केवल चाय बेचने वाले ही करेंगे।

तो इन प्रश्नों का जबाव हमें किसी नेता या किसी राजनीतिक दल से नहीं बल्कि खूद से ढ़ूढ़ना होगा। इसके साथ साथ विश्वविद्यालयों की भूमिका के बारे में सोचना होगा क्योंकि नीजीकरण, उदारीकरण और उदारीकरण के बाद से विश्वविद्यालयों का मंजर हर महीने हर साल बदलता रहता है। और मंजर बदलेगा तो कहीं न कहीं इसका असर हमें विश्वविद्यालयों पर दिखेगा ही। इसको समझने के लिए विभिन्न कॅालेज और विश्वविद्यालयों में चल रहे आंदोलनों को भी नजदीक से देखना होगा।

उदाहरण के तौर पर आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय को ही ले लीजिए । इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे पूर्वांचल सहित बिहार के ही अधिकांश छात्र पढ़ने के लिए आते हैं। यहाँ पढ़ने वाला अधिकतर छात्र आर्थिक रूप से निम्न या मध्यम का ही होता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आने के पीछे जो उनकी मंशा और सोच होती है वो ये कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते उन्हें सस्ते में हॅास्टल मिल जायेगा। लेकिन जब वो एडमिशन ले लेता है तो जो वो सोचकर यहाँ आते है ठीक उसके उलट होता है। हॅास्टल की सीटें इतनी कम हैं कि सभी को हॅास्टल मिल पाना असंभव है। अगर हॅास्टल मिल भी गया तो आप वहाँ रहेंगे कि नहीं ये हॅास्टल में रहने वाले अवैध छात्र तय करते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हॅास्टल में जितनी सीटें हैं सभी सीटों पर एलाटमेंट तो होता है पर छात्र वहाँ रहते नहीं। एक दो हॅास्टलों को छोड़ दें तो लगभग सभी हॅास्टलों में ज्यादातर अवैध लोग रह रहे हैं। ऐसे में छात्रों को क्या करना चाहिए? अब इन छात्रों के सामने दो विकल्प होते हैं या तो वे बाहर कमरा लेकर रहें या वापस घर चले जायें।

यही कहानी है इलाहाबाद विश्वविद्यालय के आम छात्रों की। इन छात्रों में अगर कोई छात्र इस बात को लेकर प्रशासन के रवैये पर सवाल उठाया भी है उसे किसी तरह डराकर चुप करा दिया जाता हैं। इन छात्रों में ऐसा ही एक छात्र है रूस्तम कुरैशी जिससे मैं एक साल से जानता हूँ। रूस्तम कुशीनगर का रहने वाला है। उसने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और उसे हॅास्टल भी मिला। हॅास्टल में वो एक महीने ही रहे होंगे कि हॅास्टल में रह रहे दबंगो ने उन्हें मारा और धमकी दी कि वो हॅास्टल छोड़ दे। रूस्तम उसी दिन चीफ प्रॅाक्टर, डीएसडबल्यू से मिले लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। रूस्तम हॅास्टल छोड़कर अपने दोस्तों के यहाँ रहने लगे। वो दो किसी एक दोस्त तो दो दिन किसी और दोस्त के यहाँ रहते हैं। बता देना जरूरी है कि इलाहाबाद में कमरों का किराया एक सामान्य छात्र के लिए बहुत होता है। जब विश्वविद्यालय प्रशासन से उम्मीदें खत्म हो गयी तो रूस्तम ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। तब कोर्ट ने प्रशासन को ये नोटिस जारी किया कि दो हफ्ते के अन्दर रूस्तम को सुरक्षा के साथ उनका कमरा दिलाया जाए। इधर प्रशासन लगातार बहाने बनाता रहा। एक साल से ज्यादा समय हो चुका है इस मामले का निस्तारण नहीं हुआ। एक बार फिर कोर्ट की अवमानना को लेकर रूस्तम कोर्ट जाना पड़ा है। फिलहाल अभी सुनवाई नहीं हुई है और कोर्ट का फैसला आना है।

ये हाल सिर्फ एक छात्र का नहीं है बल्कि हजारों छात्रों का है जो कुछ कर गुजरने का सपना लेकर आये बाहर कमरा लेकर रह रहे हैं। आये दिन इनकी मकानमालिकों से बेहताशा किराया बढ़ाने को लेकर कहा-सुनी होती है। इन मकानमालिकों की मर्जी से किराया जब चाहे किराया बढ़ाया दिया जाता है। अगर छात्र छात्रावास को लेकर धरने, प्रदर्शन करतें हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन उनको नोटिस जारी कर देता है कि वो विश्वविद्यालय के काम में बाधा पहुँचा रहे हैं। अब ऐसे में छात्र क्या करें सिवाय राजनीति के। विश्वविद्यालय में हॅास्टल नहीं मेस नहीं टॅायलेट नहीं पुस्तकालय में नई किताबें नहीं तब तो छात्रों को मजबूर होकर राजनीति करना ही पड़ेगा। और अब सरकार जो छात्रों का अंतिम रास्ता है आंदोलन का रास्ता उसको ही पुलिस के दम से बंद कर देना चाहती है। छात्रों को बेरहमी से पीटा जा रहा नॅान-नेट फेलोशिप का आंदोलन हो, रोहित वेमुला का आंदोलन या फिर जेएनयू का आंदोलन पुलिस की बर्बरता को हम देख ही चुके हैं। लेकिन इन छात्रों को अब पुलिस की लाठियों की आदत सी हो गयी है। चूंकि सरकारों का विरोध इन विश्वविद्यालय के कैमप्सो से ही शुरू होता है अतः सरकार इस मुखर आवाज को ही दबा देना चाहती है। इसीलिए बार-बार हमें ये नसीहत दी जा रही है कि आपका काम पढ़ाई करना है। तब क्या स्मृति ईरानी, अरूण जेटली, वैकैया नायडू और रूड़ी साहब इसका जवाब देंगे कि जब बुनियादी सुविधाएं ही नहीं होगी तो छात्र उसको हासिल करने के लिए राजनीति ना करें तो क्या करें या केवल राजनीति ना करने की नसीहत देंगे।

ये लेखक के निजी विचार है कोहराम न्यूज़


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें