अहमदाबाद  साल 2012 में नरोदा पाटिया नरसंहार मामले के चार प्रमुख आरोपियों को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। पूर्व मंत्री माया कोडनानी, बजरंग दल का पूर्व नेता बाबू बजरंगी, कोडनानी का सहयोगी रह चुका किशन कोरनानी और नरोडा का कारोबारी मनोज कुकरानी, इन सबको अदालत ने दोषी माना था। इस जनसंहार के लगभग डेढ़ दशक बाद, भारी जन दबाव और एक के बाद एक मुकदमों की रोशनी में चारों दोषियों की सेहत अक्सर की बिगड़ती रहती है। चारों को लगातर चिकित्सीय सहायता की जरूरत पड़ती रहती है।

 गोधरा कांड के एक दिन बाद, 28 फरवरी 2001 को हुए नरोदा पाटिया...

14 साल पहले आज ही के दिन गोधरा रेलवे स्टेशन पर 59 कारसेवकों को जिंदा जलाया गया था। इस घटना के बाद गुजरात में जो भयानक सांप्रदायिक दंगे शुरू हुए, उनमें 1,044 से भी ज्यादा लोग मारे गए। कोडनानी को उच्च न्यायालय की ओर से स्वास्थ्य आधार पर स्थायी जमानत मिल गई। इसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया था। उधर बजरंगी, कोरनानी और कुकरानी भी थोड़े-थोड़े दिनों बाद इलाज कराने के लिए जेल से बाहर आते रहते हैं। फिलहाल केवल बजरंगी ही जेल में है, जबकि बाकी तीनों दोषी कई बीमारियों का इलाज कराने को लेकर जेल से बाहर हैं।

बजरंगी को मधुमेह की दिक्कत है और उसके एक आंख की रोशनी में चली गई है। जो आंख देख पाती है, वह भी एक फुट से ज्यादा दूर नहीं देख पाती। उसने उच्च न्यायालय से कई बार अस्पताल में इलाज कराने के लिए जमानत ली, लेकिन ठीक नहीं हो सका। उधर किशन कोरनानी के लिर में दिक्कत है। उसे आंतों का कैंसर भी है। ऑपरेशन के लिए उसे परोल पर छोड़ा गया है। मनोज कुकरानी को 28 दिसंबर 2015 को जमानत मिली। उसे कैंसर है। 2012 में अदालत का फैसला आने के केवल 2 महीने पहले ही उसे लकवा हुआ था।

अगस्त 2012 में विशेष जज डॉक्टर ज्योत्सना याज्ञनिक ने बजरंगी और कुकरानी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दोनों को नरोदा पाटिया मामले में दोषी पाया गया था। मालूम हो कि 28 फरवरी 2002 को हुए इस नरसंहार में 97 लोग मारे गए थे। कोडनानी को 28 साल कैद की सजा मिली और कोरनानी को 21 साल की जेल हुई। चारों ने अपनी सजा के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील किया और उनका मामला अभी लंबित है।

बजरंगी के एक करीबी ने बताया, ‘उसे पहले से मधुमेह था, लेकिन जेल जाने के बाद वह अपनी देखभाल नहीं करता था। ख्याल ना रखने के कारण उसका मधुमेह बहुत गंभीर हो गया। अब वह लगभग अंधा हो गया है। उसे उच्च न्यायालय से कई बार जमानत मिली, लेकिन उसका इलाज कर रहे डॉक्टरों को उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है।’ एक महीने पहले बजरंगी ने अपनी जमानत की अवधि को बढ़ाने की याचिका जमा की थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे ठुकरा दिया।

कोरनानी को साल 2002 से ही कैंसर है। गोधरा कांड के एक साल बाद ही उसे कैंसर होने का पता चला था। जेल जाने के बाद से उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई। साबरमती जेल प्रशासन ने ऑपरेशन कराने के लिए उसे परोल पर छोड़ा था। उसके परिवार के एक सदस्य ने बताया, ‘उसका तीन बार ऑपरेशन हो चुका है और अब जल्द ही चौथी बार भी उसका ऑपरेशन होगा।’

जब हमने कोरनानी से संपर्क तो किया, तो उसने कहा, ‘मैं कुछ भी टिप्पणी नहीं कर सकता क्योंकि यह मामला अभी अदालत में लंबित है। मुझे परोल पर रिहा किया गया है। यह सच है कि चौथी बार मेरे कैंसर का ऑपरेशन होने जा रहा है।’

गुजरात उच्च न्यायालय ने इससे पहले उसे अस्थायी जमानत देने से इनकार करते हुए 30 नवंबर तक जेल से बाहर रहने का फैसला दिया था। दिसंबर में जेल अधिकारियों ने उसे परोल पर रिहा किया। 28 साल कैद की सजा मिलने पर कोडनानी को मानसिक सदा लगा। मालूम हो कि नरोदा पाटिया नरसंहार में कोडनानी को मुख्य दोषी माना गया है। जेल में उसकी सेहत लगातार गिरती गई है। उसे कई तरह की शारीरिक और मानसिक बीमारियां हुईं। उच्च न्यायालय ने उसे जमानत दी। उसे ऑस्टियोपोरोसिस, आंत में टीबी, दिल की बीमारी और रीढ़ की हड्डी में दिक्कत के अलावा दिमागी गंभीर अवसाद भी हो गया है।

डॉक्टरों ने कोडनानी के अंदर आत्महत्या की प्रवृतियां भी देखी हैं। अपनी दिमागी बीमारी के इलाज के सिलसिले में उसे बिजली के झटके भी दिए गए। उसके करीबी सूत्र ने बताया, ‘फिलहाल वह अपने शाहीबाग स्थित घर में चौबीसों घंटे चिकित्सीय निगरानी में रह रही है।’ हमारा द्वारा संपर्क किए जाने पर कोडनानी ने कुछ भी टिप्पणी करने से इनकार करते हुए बस इतना कहा, ‘मैं बीमार हूं।’ (नवभारत टाइम्स)


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