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आज जो ख़ास स्टोरी हम आपके लिए लेकर आये है वो कहानी काफी किवदंतियों से आपका मोह भंग कर सकती है. पीर फ़कीर की मजारों, मंदिरों में आपने वो गोल सा पत्थर तो देखा होगा जिसे 7,9 या 11 लोग एक ऊँगली के इशारे से उठा लेते है जैसे उस चमत्कार का राज़ भी सामने आ चूका है की पत्थर अपनी गोल बनावट के कारण एक या दो शख्स से नही उठम पाता जब तक की उसे चारो तरफ से समान बल ना मिले.. खैर यह तो उस चमत्कारी पत्थर की बात हुई अब नीचे जो स्टोरी प्रकाशित की जा रही है उसका वैज्ञानिक कारण जानकर आपका चमत्कारी कहानियों से मोहभंग हो सकता है. कोहराम न्यूज़ को एक एक करके और भी ऐसी चमत्कारी कहानियों को प्रकाशित करता रहेगा और ढोंग से पर्दा उठाता रहेगा.

आइये अब बात करते है पानी पर तैरने वाले पत्थरो की 

रादौर ब्लॉक के कांजनु गांव में आजकल पानी में तैरने वाले दो पत्थरों का चर्चा सारे इलाके में सरगर्म है। इन तैरने वाले पत्थरो को देखने बहुत लोग आ रहे हैं। अलाहर गांव के राजकीय विद्यालय में जब इसकी चर्चा पहुँची तो बालकों ने स्कूल के विज्ञान अध्यापक दर्शन लाल से इस बारे जानकारी मांगी। विज्ञान अध्यापक जो कि हरियाणा विज्ञान मंच के जिला समन्वयक भी हैं। वे स्कूल के दो विद्यार्थियों इतेश और अरुण के साथ उस स्थान पर गए, जहां स्थानीय लोगो ने वो दोनों पत्थर पानी में तैरा कर प्रदर्शन के लिए रखे हुए हैं। एक पत्थर जिसका भर 28 किलोग्राम है वो एक बड़े पतीले में पूरी तरह तैर रहा है। जबकि दूसरा पत्थर जिसका भार 53 किलोग्राम बताया गया है उसको एक नलकूप की होदी में रखा है। होदी में रखा पत्थर पूणरूप से नहीं तैर रहा है। उसका एक किनारा होदी की तली को छू रहा है।

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स्थानीय लोग किसी चमत्कार के होने की खुल कर तो घोषणा नहीं कर रहे परन्तु दबी जबान में इन पत्थरों को चमत्कारी कहा जा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार उन्हें यह दोनों पत्थर गांव के साथ बहती पश्चिमी यमुना नहर से तैरते जाते हुए दिखे। उन्होंने उन पत्थरों को नहर से निकाल कर स्थानीय मन्दिर में रख दिया है। जहां लोग उनके अवलोकनार्थ पहुँच रहे हैं।

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विज्ञान अध्यापक दर्शन लाल ने बताया कि आर्कमडीज के उत्प्लावन बल के सिद्धांत के अनुसार पानी में डाली गयी कोई वस्तु जितना पानी हटाती है उस पानी का भार यदि वस्तु के भार से अधिक हो तो वह वस्तु तैरेगी अन्यथा डूब जायेगी। दोनों पत्थरों में असंख्य छिद्र है। जिनमे वायु भरी है। जिस कारण पत्थर तैर रहे है। लकड़ी का कोयला यानि चारकोल भी वायु छिद्र होने के कारण ही पानी में तैरता है। पानी में तैरने वाले पत्थर प्युमिस पत्थर कहलाते हैं प्युमिस पत्थर सरंघ्रीय या छिद्रयुक्त होते हैं जिनके सुराखों में वायु भरी होती है।

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प्यूमिस पत्थरों की आंतरिक संरचना एकदम ठोस न होकर अंदर से स्पंज अथवा केक/ब्रेड जैसी छिद्रयुक्त होती है जिसमें भीतर गहराई तक में वायुकमरे बने होते है। इन वायु प्रकोष्ठों के कारण ये पत्थर आयतन में बड़े होने के बाद भी घनत्व के से तुलनात्मक हल्के होते है यदि इतने बड़े आकार का अन्य पत्थर लिया जाए तो वो घनत्व के हिसाब से बहुत भारी होगा और शर्तिया डूब जायेगा। स्पोंज संरचना होने के कारण इनका आयतन (जगह घेरना) अधिक और घनत्व (भार) कम होने के कारण ये पत्थर पानी में तैर रहे है। उन्होंने यह भी बताया कि पत्थर में एक दो जगह ईंट रंग के टैराकोटा के टुकड़े धंसे दिखाई पड़ते हैं जो इशारा करते हैं कि ये किसी तटबंध या सीमेंट निर्माण के टूटे हुए हिस्सा या चट्टानी टुकड़ा है जो पानी के अम्लीय प्रदूषण के कारण वह खुर गया और छिद्रयुक्त होगया हो सकता है।

स्कूल की विज्ञान प्रयोगशाला में बालकों ने पत्थर के नमूने का विश्लेषण किया। पत्थर के एक टुकड़े के चूर्ण के जलीय विलयन की पी एच वेल्यु हल्की सी क्षारीय है। जबकि लिटमस टेस्ट उदासीन है। विद्यालय में बच्चों को इस पत्थर के नमूने के परीक्षण की टास्क दी गयी। बालकों ने लिटमस टेस्ट, पी एच टेस्ट, फिनोफ़थलीन टेस्ट और पत्थर चूर्ण की हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से क्रिया सबंधित टेस्ट किये। इस घटना से बालकों में खोजी प्रवृति का विकास हुआ और उन्हें किसी भी घटना की सिलसिलेवार जांच करने का ज्ञान मिला। बालकों ने स्थानीय समस्याओं और अंधविश्वासों को वैज्ञानिक तरीके से हल करने का प्रयास किया।

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पत्थर का आगे चाहे जो भी हो पर विद्यार्थियों में आज इन्वेस्टिगेशन करने और तार्किक दृष्टिकोण से तथ्यों को समझने-जाचने और फिर निष्कर्ष निकलने की दक्षता विकसित हुई।

दुनिया में कुछ भी चमत्कार नहीं है सब चमत्कार कहे जाने वाले घटनाओं के पीछे कुछ न कुछ लॉजिक होता है और शिक्षा उस लॉजिक को समझने का प्लेटफार्म प्रदान करती है।

चित्र और लेख (साभार) : दर्शन बावेजा (Darshan Baweja)


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