रायपुर – आज कल देश में अगर सबसे अधिक कोई मुद्दा छाया हुआ है तो वो है हिन्दू और मुस्लिम विचारधारा का जहाँ देश भर में दोनों सम्प्रदायों का इस्तेमाल नेतागण अपने वोट बैंक के तौर पर कर रहे है वहीँ देश की असली आत्मा को जीवित रखने वाले लोग भी वास करते है.

कहीं पढ़ा था की हम से मिलकर हिंदुस्तान बनता है ह से हिन्दू और म से मुसलमान, लोग चाहे इस गंगा जमुनी तहज़ीब का कितना भी विरोध करे लेकिन सैकड़ों वर्षों से यही सभ्यता हमारे देश की पहचान बन गयी है.

आज हम बात करेंगे एक बैरागी बाबा की जो वैसे देखा जाए तो हिन्दू धर्म से सम्बन्ध रखते है लेकिन रमजान के महीने में शुरू हो जाते है इबादत करने. हिन्दू परिवार में जन्मे केवट दास बैरागी रमजान के दौरान रोजेदारों को सेहरी के लिए जगाते हैं, यही नहीं वे आखिरी के पांच रोजे भी रखते हैं। ये सिलसिला कई सालों से जारी है।

baba sehri hindu

सहरी में निकल पड़ते है ढोलक लेकर और गा गाकर सबको जगाते है 

जिस समय मुस्लिम समुदाय के लोग अपने बिस्तरों में आराम कर रहे होते है उस समय राजातालाब इलाके में रहने वाले
बैरागी बाबा के ढोलक की मधुर आवाज़ कानों में पड़ती है ‘मेरे रमजान करम इतना किए जा, मुझ पर याद ताजी तेरी दीदार बरस मैं पाऊं…’ हाथ में घुंघरू बांध, पाक चादर ओढ़े  इस मधुर गीत के कानो में पड़ते ही राजातालाब के समीप रहने वाले लोग समझ जाते है की सहरी का समय हो गया है.

सपने में किसी बाबा ने दिए थे दर्शन 

वे बताते हैं कि करीब 15-17 साल पहले उनके सपने में कोई बाबा आए थे। उन्होंने कहा कि जा, बाहर जाकर लोगों को सेहरी करने उठा। इस सपने को उन्होंने अल्लाह का हुक्म मान लिया और तबसे रोजेदारों को जगाने की जिम्मेदारी संभाल ली। केवट बाबा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन भजन और गीत आसानी से सीख जाते हैं, वे कहते हैं कि ऊपरवाले की मेहरबानी है जो मैं उनके बंदों के कुछ काम आता हूं।

रोज चलते हैं पांच किलोमीटर

रमजान के महीने में केवट बाबा रोज सुबह पांच किलोमीटर पैदल चलते हैं। राजातालाब क्षेत्र के लोगों का कहना कि सालों से रमजान के दौरान वे केवट बाबा की आवाज से ही उठते हैं। वे कहते हैं कि उनकी ढोलक और गीत में अलग ही आकर्षण है, जो उनकी आवाज कानों में पड़ते ही नींद खुल जाती है।


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